अग्रलेखआपला विदर्भगोंदिया

“शिक्षक” : पोवारी भाषिक और साहित्यिक क्रांति के केंद्र-बिंदु

“शिक्षक” : पोवारी भाषिक और साहित्यिक क्रांति के केंद्र-बिंदु
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– इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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शिक्षक को राष्ट्र का शिल्पकार भी कहा जाता है। क्योंकि नयी पीढ़ी के निर्माण में उसका महत्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षक होना यह एक व्यवसाय है।‌ “ज्ञान” यह शिक्षक के अध्यापन की विषय-वस्तु है। शिक्षक का नित्य संबंध छात्र -छात्राएं, आदर्शवादी विचार , संस्कृति, संस्कार एवं सुधारों के साथ होता है। इसलिए ऐतिहासिक कालखंड में जब – जब सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक क्रांतियां आयी है तब-तब उसमें शिक्षा एवं शिक्षक ने केंद्रीय भूमिका निभाई है।
शिक्षक एक ऐसा व्यवसाय है, जिसके रंग में व्यक्ति रंग जाता हैं। शिक्षक केवल छात्र – छात्राओं को संस्कारित नहीं करता बल्कि वह अपने व्यवसाय में रहकर स्वयं भी संस्कारित होता जाता है। इसलिए जो एक बार शिक्षक बन जाता है, उसकी प्रज्ञा जागरूक हो जाती है। परिणामस्वरुप व्यक्ति,समाज, राष्ट्र, संस्कृति के कल्याण का चिंतन यह उसके स्वभाव का एक अभिन्न अंग बन जाता है।
स्वाभाविकता कुछ शिक्षकों की सृजनशीलता एवं साहित्य में भी रुचि होती है । परिणामस्वरुप भाषा और साहित्य के विकास में भी वें अपना महत्वपूर्ण योगदान सदैव देते आये है। प्रत्येक समुदाय जिस प्रकार अपने समुदाय के अधिकाधिक लोग लोग उच्च पदाधिकारी, राजनेता, उद्यमी, प्रगतिशील किसान के रुप में उभरने की कामना करते है,उसी प्रकार समुदाय लोग साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कामयाबी हासिल करें यह कामना भी रखना चाहिए।
आज़ादी के पश्चात पोवार समाज में
बड़ी मात्रा में युवाओं ने शिक्षक के व्यवसाय की ओर रुख किया। ईस्वी सन् २०००के पश्चात साहित्य एवं पत्रकारिता की ओर भी रुख किया। वर्तमान पोवार समाज में प्रा. शेखराम येड़ेकर( नागपुर), प्रा. प्रल्हाद हरिणखेड़े ( मुंबई) , झुंझुरका पोवारी बाल ई-पत्रिका के प्रधान संपादक श्री गुलाब बिसेन, रणदीप बिसने( उपसंपादक), श्री उमेन्द्र राहांगडाले( उपसंपादक), श्री उमेन्द्र पटले( उपसंपादक),श्री पालिकराम बिसने, श्री शेषराम येड़ेकर, श्री चिरंजीव बिसेन आदि. असंख्य व्यक्ति मराठी के अच्छे साहित्यकार भी है।
भारत की आज़ादी के पश्चात शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार के साथ-साथ अनेक समुदायों की मातृभाषाओं के सम्मुख अस्तित्व का संकट उपस्थित हुआ। पोवार समाज की पोवारी भाषा भी समाज के तथाकथित कर्णधारों द्वारा उपेक्षा की शिकार हुई और इस संकट में फंस गयी। लेकिन २०१८ की पोवारी भाषिक क्रांति के प्रेरक विचारों से प्रेरित होकर इस समाज का लगभग पूरा मराठी और हिंदी साहित्यिक वर्ग मातृभाषा पोवारी के संरक्षण – संवर्धन तथा समाज में साहित्यिक क्रांति लाने के उद्देश्य से पूर्ण उत्साह के साथ आगे आया और आज स्थिति यह हैं कि पोवार समाज का शिक्षक वर्ग पोवारी भाषिक एवं साहित्यिक क्रांति का केंद्र-बिंदु बन गया है। इसमें कुछ इंजीनियर, उद्यमी एवं अधिकारियों का भी समावेश है।श्री ऋषि बिसेन (IRS) इनका नाम भी उल्लेखनीय है। ऋषि बिसेन स्वयं उच्च प्रशासनिक अधिकारी है। लेकिन वें एक शिक्षक तथा शिक्षिका के सुपुत्र होने से
कहा जा सकता हैं कि उनके रुप में कहीं न कहीं उनके माता-पिता के संस्कार आज पोवारी भाषिक और साहित्यिक क्रांति के केंद्र-बिंदु बन गये है।
पोवारी भाषिक और साहित्यिक क्रांति को डिजिटल माध्यम ने नये पंख देने से ही यह क्रांतियां आश्चर्यजनक गति से सफ़ल हुई है। इस स्वर्णिम सफर में न्यूज़ प्रभात डिजिटल नेटवर्क के प्रधान संपादक श्री सुनील तुरकर जो एक प्रतिभाशाली शिक्षक भी हैं, उनका भी महत्वपूर्ण योगदान हैं। वें भी अपने अमूल्य योगदान के कारण भाषिक एवं साहित्यिक क्रांति के केंद्र में पदार्पण कर गये है।
पोवारी भाषिक एवं साहित्यिक क्रांति की घटनाएं अभी लिखी जा रही है। यही घटनाएं भविष्य में पोवारों के भाषिक – साहित्यिक – सांस्कृतिक इतिहास के रुप में पढ़ी जायेगी, जहां समाज के इन असंख्य शिक्षकों का नाम बहुत विनम्रतापूर्वक और श्रद्धा के साथ पढ़ा जायेगा।

-ओ‌ सी पटले
पोवारी भाषिक एवं साहित्यिक क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
गुरु. 28/12/2023.
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