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पोवारी भाषा का स्वतंत्र परिचय एवं इतिहास – इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

*पोवारी भाषा का स्वतंत्र परिचय एवं इतिहास*

*-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले* ———————————————-
♦️समाज की प्रगति या क्रांति स्वभाषा की धार पर ही उपजाई जा सकतीं है।
♦️ पोवारी के उत्थान के लिए हमें उसके पतन के कारणों की तह तक जाना होगा।
♦️ पोवारी भाषा के संरक्षण -संवर्धन एवं उन्नयन का कार्य २०१८ से युद्धस्तर पर शुरू है।
१. पोवारी भाषा का क्षेत्र
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पोवारी यह छत्तीस कुलीय पोवार समुदाय की मातृभाषा है। पोवार समुदाय मालवा – राजस्थान का मुल निवासी है। अतः उनकी मातृभाषा पोवारी मालवा – राजस्थान में ही विकसित हुई।
पोवारी का अलिखित साहित्य उच्च कोटि का है तथा भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। इस साहित्य में शादी के गीत,परहे के गीत, फुगड़ी के गाने,अंगाई गीत, लावनी, झड़ती, भजन, हाना,कहावत, मुहावरे आदि का समावेश है।
पोवार समुदाय औरंगजेब के शासनकाल में लगभग १७०० के आसपास मालवा से वैनगंंगा अंचल में स्थानांतरित हुआ एवं यहां स्थायी रुप से बस गया। इस समुदाय के लोग दक्षिणी मध्यप्रदेश एवं पूर्वी महाराष्ट्र के बालाघाट, सिवनी, गोंदिया, भंडारा इन चार जिलों में बड़ी में पाये जाते हैं। अतः वर्तमान में पोवारी भाषा का अस्तित्व वैनगंंगा अंचल में ही पाया जाता है।
२.भारतीय भाषाओं में पोवारी का स्थान
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विश्व में लगभग ७०००० भाषाएं बोली जाती है। सर्वाधिक भाषाएं न्यू गिनी में बोली जाती है। भाषा की संख्या की दृष्टि से भारत भी उल्लेखनीय राष्ट्र है। भारत में लगभग १९५०० भाषा – बोली मातृभाषा के रुप में बोली जाती है।
भारत में बोली जाने वाली भाषाओं को चार परिवार में रखा गया है। यह चार भाषा परिवार निम्नलिखित है।
२-१.आर्य भाषा समूह
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आर्य भाषा समूह में सामान्यतः उत्तर भारत में बोली जानेवाली भाषाओं का समावेश होता है।उदा. हिन्दी, मगधी, मैथिली, गुजराती, बघेली, बुंदेली, सिंधी, पंजाबी, बंगाली,नेपाली आदि.
पोवारी भाषा यह आर्य समूह की भाषा है। हिन्दी भाषी लोगों के लिए यह भाषा हिन्दी, मगधी, मैथिली , गुजराती की तरह समझने में सरल है । यह भाषा सिंधी और पंजाबी के समान समझने में कठिन नहीं है।
२-२ द्रविड़ भाषा समूह
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द्रविड़ भाषा समूह में दक्षिण की भाषाओं का समावेश होता है।उदा. कन्नड़ तेलुगु, मलयालम आदि. द्रविड़ भाषा समूह की भाषाएं समझने में कठिन है।
२-३. आॅस्ट्रो – एशियाटिक भाषा समूह
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इस भाषा समूह में मुंडा,खांसी, गोंड, संथाली आदि. आदिवासियों की भाषाओं का समावेश। होता है।
२-४. चीनी -तिब्बती भाषा समूह
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इस भाषा समूह में तिब्बती एवं बर्मी भाषा का समावेश होता है।इस समूह को नागा भाषा समूह के नाम से भी जाना जाता है।
२-५.पोवारी भाषा हिन्दी भाषा के समान
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भारतीय संविधान में पोवारी भाषा को हिन्दी भाषा के उप-भाषाओं की सूची में अभिलेखित किया गया है। हिन्दी भाषा के भी पूर्वी हिन्दी, पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी हिन्दी, बिहारी हिन्दी एवं पहाड़ी हिन्दी यह पांच प्रकार है। पोवारी भाषा पूर्वी हिन्दी के समान है।
३. पोवारी भाषा का विकास
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भारत में जातियों की तथा उनकी मातृभाषा की उत्पत्ति मध्ययुग ( नवी सदी से अठरावीं सदी)में हुई है, ऐसा माना जाता है। इस आधार पर प्रतीत होता है कि मध्ययुग के प्रारंभ में पोवार जाति एवं पोवारी भाषा की उत्पत्ति हुई है।
ईस्वी सन् की ९ वीं सदी से बारहवीं सदी तक मालवा में परमार वंश का शासन था। परमार वंश के चक्रवर्ती महाराजा भोज के शासनकाल ( ईस्वी सन् १०००-१०५५) में भारत में कृषि,अर्थ, शिक्षा, धर्म, संस्कृति, सैनिक सामर्थ्य आदि. सभी दृष्टि से उन्नत अवस्था में था। उस समय संस्कृत, प्राकृत एवं पाली भाषा अस्तित्व में थी। स़स्कृत एवं प्राकृत से ही हिन्दी आदि अनेक भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। अतः संभवतः पोवारी भाषा का साहित्य भी राजाभोज के शासनकाल के आस-पास ही उन्नतालस्था में पहुंचा होगा। वर्तमान में जो बहुत सुंदर एवं अप्रतिम पुरातन विवाह गीत, परहे के गाने, कहावतें, मुहावरे आदि. पाये जाते है, वे शायद इसी पूर्व मध्ययुग की देन है।
४. पोवारी को लोकभााषा का स्वरूप
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पोवार समुदाय के लोग १७०० के आसपास मालवा से वैनगंंगा अंचल में स्थानांतरित हुए तब वें अपने साथ पोवारी भाषा एवं संस्कृति भी ले आये।
वैनगंगा अंचल में आने के पश्चात उन्हें यहां खेती- किसानी करने के लिए भूमि उपलब्ध हुई। परिणामस्वरुप उन्होंने खेती का व्यवसाय अपनाया। गोंड, मराठा एवं ब्रिटिश शासनकाल में पोवारों को अनेक गांवों की मालगुजारी एवं जमींदारियां भी प्राप्त हुई।
जिन गांवों में पोवार मालगुजार , मोकासी अथवा जमींदार थे उन गांवों में सभी जाति के लोग पोवारी भाषा एवं संस्कृति से प्रभावित होना स्वाभाविक था।
अतः जिन-जिन गांवों मे पोवार मालगुजार -जमींदार हुआ करते थे, वहां के नाई, धोबी, टेलर, सुनार, बढ़ई, खाती, करंडी, होलिया, नगारसी, पंडित, गारपगारी, पुजारी, मालगुजारों के बाड़ों के घोड़ों को प्रशिक्षण देनेवाली मुस्लिम महिला आदि. सब लोग पोवारों के साथ पोवारी भाषा में बातचीत करते थे। इतना ही बल्कि अन्य गोंड, गोवारी, कलार , मुसलमान आदि. अन्य जाति- धर्म के लोग भी पोवारों के साथ पोवारी भाषा में बातचीत किया करतें थे। इसप्रकार मराठा एवं ब्रिटिश शासनकाल में पोवारी भाषा को गांवों में लोकभाषा का स्वरूप प्राप्त था।
उपर्युक्त वर्णन प्रस्तुत लेखक ने किसी इतिहास ग्रंथ के आधार पर उदृध नहीं किया है। बल्कि उसका जन्म १९४६ में एक मालगुजार परिवार में हुआ। १९५६ में Jamindari Abolishing Act के अनुसार मालगुजारी – जमींदारी नष्ट की गई। लेकिन फिर भी लगभग १९७० तक मालगुजार – जमींदारों को प्रतिष्ठा प्राप्त थी।
उस समय का जो सामाजिक चित्र प्रस्तुत लेखक ने अनुभव किया एवं विविध गांवों का चित्र और चरित्र उसके अवलोकन में आया उसी आधार पर अनुमान करते हुए लेखक ने उपर्युक्त वर्णन किया है।
४. मातृभाषा के पतन के मौलिक कारण ————————————————
आज़ादी के पश्चात पोवारी भाषा पर अस्तित्व का संकट उपस्थित हुआ। और उसका पतन भी हुआ। इसपर काफी चर्चा भी हुई। लेकिन इस चर्चा में उपरी कारणों का ही समावेश था। मौलिक कारण चर्चा की परिधि के बाहर ही रह गये। यहां हम आज़ादी के पश्चात पोवारी भाषा के सम्मुख उपस्थित हुये अस्तित्व के संकट के मौलिक कारणों को निरुपित करेंगे। यह मौलिक कारण निम्नलिखित है –
४-१.आधुनिक शिक्षा नीति
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आज़ादी के पश्चात शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। जो बालक स्कूल में शिक्षार्जन के लिए जाने लगे, उन बालकों के शिक्षा के माध्यम को ही उनकी मातृभाषा के रुप में अभिलेखित किया गया। परीक्षा में “निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर अपनी मातृभाषा में निबंध लिखिये।” इस प्रकार के प्रश्न पूछे जाने लगे और छात्रों को अपने शिक्षा के माध्यम में उत्तर हल करने की सूचना दी जाने लगी। परिणामस्वरुप शिक्षित व्यक्तियों में पोवारी भाषा को मातृभाषा के रुप में देखने का नज़रिया नष्ट हो गया। लोग शिक्षित होने पर बोलचाल में पोवारी के स्थान पर हिन्दी, मराठी, अथवा अंग्रेजी का प्रयोग करने लगे। इसप्रकार आधुनिक शिक्षा पोवारी भाषा के अस्तित्व के संकट का एक मौलिक कारण बन गयी।
४-२. आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर्णधार
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उपरोक्त प्रकार से शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों ने जब अपने हाथों मे समाज की बागड़ोर संभाली तो उन्होंने पोवारी भाषा की जमकर उपेक्षा की। इन लोगों ने पोवारी भाषा को हेंगली भाषा संबोधित करके उसका त्याग करने के लिए युवाशक्ति को प्रेरित किया। अतः आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर्णधारों का मातृभाषा पोवारी के महत्व के प्रति अज्ञान यह पोवारी भाषा के अस्तित्व के संकट का दूसरा मौलिक कारण है।
४-३.पवारीकरण की गलत नीति
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डाॅ. ज्ञानेश्वर टेंभरे, नागपुर इनके द्वारा १९८२ से पोवारी एवं भोयरी इन दो अलग-अलग भाषाओं को एक करने का षड़यंत्र शुरू हुआ। इसके तहत पोवारी( Powari ):इस मूल नाम को नष्ट करने के उद्देश्य से पोवारों की भाषा के ऐतिहासिक नाम के स्थान पर पवारी (Pawari)यह गलत नाम प्रस्थापित करने का कार्य हुआ। परिणामस्वरुप मातृभाषा पोवारी की उपेक्षा हुई तथा उसका पतन हुआ।
‌‌ईस्वी सन् २००० से २०१५ तक यादोराव राहांगडाले ( गोंदिया), हीरालाल बिसेन (नागपुर) , अॅड .मनराज पटले ( साकोली) तथा जयपालसिंह पटले ( वारासिवनी) आदि महानुभावों ने पोवारी भाषा के संरक्षण की ओर कदम बढ़ाया तो पवारीकरण की नीति ने उस कदम को गलत दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। परिणामस्वरुप मातृभाषा पोवारी प्रेमी जयपालसिंह जी को भी अपने अभियान को मायबोली पोवारी/ भोयरी बचाओ अभियान नाम से संबोधित करना पड़ा।( राजाभोज गीतांजलि,२०१५, लेखक- जयपाल धाडूजी पटले, पृष्ठ क्र.५५)
५. २०१८ की सफल भाषिक क्रांति
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मातृभाषा पोवारी के उत्कर्ष में अनेक बाधाएं थी। लेकिन २०१८ में सभी बाधाओं को पार करते हुए तथा जहां संघर्ष की आवश्यकता थी वहां निर्भयता से वैचारिक संघर्ष करते हुए भाषिक क्रांति को सफ़ल बनाया गया। परिणामस्वरुप वर्तमान में पोवारी भाषा में साहित्यिक क्रांति का नया दौर चल रहा है। अब मातृभाषा पोवारी का भविष्य उज्ज्वल है।
६. पोवारी एवं हिन्दी का स्वरूप
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पोवारी भाषा हिन्दी की उपभाषा है तथा वह लगभग हिन्दी के समान ही है। पोवारी एवं हिन्दी में कर्ता ( Subject )एवं क्रिया ( Verb) में अंतर पाया जाता है। यह अंतर निम्नलिखित है –
६-१. पोवारी भाषा में वर्तमान काल की क्रिया के रुप में जासू , जाय रहीं सेव, जासेज्, जाय रहया सेज आदि शब्द प्रयुक्त होते है।उदा –
(१)पोवारी -१. मी मुंबई जासू.
हिन्दी – मैं मुंबई जाता हूं।
(२)पोवारी – मी मुंबई जाय रहीं सेव.
हिन्दी – मैं मुंबई जा रहा हूं
(३) पोवारी- आम्हीं मुंबई जासेज्.
हिन्दी – हम मुंबई जाते है।
(४) पोवारी – आम्हीं मुंबई जाय रहया सेज्.
हिन्दी – हम मुंबई जा रहें हैं।

६-२. पोवारी भाषा में भूतकाल की क्रिया गयेव होतो, जाय रहेव होतो, गया होता, जाय रहया होता आदि स्वरुप में प्रयुक्त होती हैं। उदा –
(१) पोवारी -मी मुंबई गयेव होतो.
हिन्दी – मैं मुंबई गया था।
(२) पोवारी -मी मुंबई जाय रहेव होतो.
हिन्दी – मैं मुंबई जा रहा था।
(३) पोवारी -आम्हीं मुंबई गया होता.
हिन्दी -हम मुंबई गये थे।
(४) पोवारी -आम्हीं मुंबई जाय रहया होता.
हिन्दी -हम मुंबई जा रहें थे ।
६-३. पोवारी भाषा में भविष्य काल की क्रिया जाऊं,जाबीन आदि स्वरुप में प्रयुक्त होती है ।उदा-
(१) पोवारी -मी मुंबई जाऊं.
हिन्दी – मैं मुंबई जाऊंगा।
(२) हिन्दी -आम्हीं मुंबई जाबीन.
हम मुंबई जायेंगे।
६-४. पोवारी भाषा के प्रश्नार्थक वाक्य में क्रिया (Verb)कब जाएगा? कब जाओगे?
आदि. स्वरुप में प्रयुक्त होती है।उदा –
(१) पोवारी -तूं मुंबई कब् जाजो?
हिन्दी – आप मुंबई कब जाओगे?
(२) पोवारी – तुम्हीं मुंबई कब् जाओ?
हिन्दी – आप लोग मुंबई कब जाओगे?
७. पोवारी भाषा की प्रमुख विशेषताएं
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पोवारी एवं हिन्दी की उपर्युक्त तुलना से स्पष्ट होता है कि पोवारी भाषा यह एक सरल तथा मीठी भाषा है। अच्छी भाषा में ध्वनि एवं लिपि में समानता होनी चाहिए। अंग्रेजी भाषा में ध्वनि एवं लिपि में समानता न होने के कारण भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह निकृष्ट भाषा मानी जाती है। ध्वनि एवं लिपि की समानता समानता हिन्दी एवं पोवारी दोनों में पायी जाती है। इसलिए दोनों भाषाएं उत्तम है। पोवार समुदाय के लोगों ने अपनी मातृभाषा पोवारी का उसके मूल नाम के साथ संरक्षण -संवर्धन करना चाहिए। मातृभाषा पोवारी उन्नत होगी तो पोवार समाज भी उन्नत माना जायेगा एवं उसे विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

*-पोवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.*
*रवि.३१/१२/२०२३.*
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