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पोवारी भाषिक क्रांति यह साहित्य जगत की एक ऐतिहासिक घटना ! — इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

पोवारी भाषिक क्रांति यह साहित्य जगत की एक ऐतिहासिक घटना : –  इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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♦️ भाषा की खुबसूरती एवं रचना की विषय-वस्तु यही भाषा की ताकत है। इसी मूलतत्व को आधार मानकर विविध स्वरचित लेख और कविताओं के माध्यम से युवाशक्ति को पोवारी भाषा की ताकत का एहसास कराया गया। इसलिए २०१८ में पोवारी भाषिक क्रांति आश्चर्यजनक गति से सफल हुई।
♦️ विगत ६ वर्षो (२०१८-२३) में पोवारी भाषा में जितना साहित्य सृजन हुआ है एवं पोवारी भाषा पर जितना लिखा गया है, वह अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया हैं ‌। पोवारी भाषा के प्रदीर्घ इतिहास में पोवारी भाषा पर इतनी अधिक मात्रा में कभी नहीं लिखा गया।
♦️ पोवारी भाषिक क्रांति यह न केवल पोवार समुदाय के इतिहास की बल्कि भारतीय भाषाओं के इतिहास की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। इस ऐतिहासिक घटना का चित्र एवं चरित्र लिपिबद्ध करना परम् आवश्यक है। यह लेख उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
🔷१.भाषिक क्रांति के विभिन्न अर्थ
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(१) पोवारी बचाओ! बचाओ! के आप्लावित स्वर समाज में उठ रहे थे ऐसे चिंताजनक माहौल को बदल दिया गया और पोवारी भाषा के उत्कर्ष के लिए चाहें आकाश के तारे तोड़के लाने हो अथवा ज्ञान सागर की गहराई से नयी – नयी संकल्पनाएं लानी हो तो भी वह कार्य हम करेंगे। यह क्षमता हमारी युवाशक्ति में भी है। इस प्रकार का विश्वास समाज को दिलाते हुए हम सब मातृभाषा पोवारी के उत्कर्ष में जूट गये। परिणामस्वरुप वर्तमान में मातृभाषा पोवारी के आल्हादकारी स्वर गूंजने लगे है। इसी का ‌नाम हैं- “पोवारी भाषिक क्रांति!”
(२) समाज के तथाकथित कर्णधार ही पोवारी भाषा को हेंगली भाषा संबोधित करके उससे किनारा कर रहे थे। ऐसी विपरीत स्थिति में पोवारी भाषा अपनी शब्द संपदा के कारण कुछ हद तक हिन्दी से भी अधिक मधुर -मीठी भाषा है, इसे सप्रमाण सिद्ध किया गया और पोवारी के प्रति प्रतिकूल सामाजिक माहौल को अनुकूलता में तब्दील किया गया, इसका नाम हैं- “पोवारी भाषिक क्रांति!”
(३) पोवारी भाषा का भविष्य जब सबको अंधकारमय प्रतीत हो रहा था, ऐसी विपरीत स्थिति में पोवारी भाषा को हिन्दी एवं मराठी साहित्यिक मंचों पर प्रतिष्ठित कराने का मार्ग प्रशस्त किया गया, उसका नाम है – “पोवारी भाषिक क्रांति!”
(४)पोवार समाज में जब पटील की टूरी पराय गयी,‌पोवार की टूरी , बाई मोरों नवरा जमादार थे ऐसे लांच्छनास्पद गीत बनाने का प्रचलन जड़े जमा लिया था एवं इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कोई नहीं दिखा रहा था , ऐसी स्थिति में इस प्रकार की गलत सोच के विरुद्ध जनमत जागृत किया गया और पोवारी के गरिमामय -गौरवशाली साहित्य सृजन का पथ आलोकित किया गया उसी को – “पोवारी भाषिक क्रांति” के नाम से संबोधित किया जाता है।
(५)पोवारी लोकसाहित्य समृद्ध है। शादी के हर दस्तूर के अलग-अलग गीत है। अनेक गीत पोवारी आन -बान -शान के अनुकूल है। लेकिन कुछ गीत लांच्छनास्पद है। उदा. बाल खेलने के दस्तूर का एक गीत पोवार समाज के एक विद्वान प्रोफेसर की किताब(पवारी ज्ञानदीप पृष्ठ क्र.(११८-१९) में है। इस गीत की दो पंक्तियां निम्नलिखित है –
बजाव बजाव रे होल्या बाजा नाना-परी।
तोला देबीन रे होल्या तोला पोवारीन टूरी।।
उपर्युक्त गीत के हर छंद में डफली वालें को पोवार की लड़की देने की बात कही गई है। इस प्रकार के गीत एवं पोवारी साहित्य का प्रखर विरोध करते हुए , पोवारी साहित्य को सही दिशा देने का एवं साहित्यिकों को समाज सुधार का लक्ष्य सामने रखकर साहित्य सृजन के लिए प्रेरित करने का अभिप्राय हैं – “पोवारी भाषिक क्रांति!”
(६) पोवारी बोली को स्वाभिमान के साथ भाषा के नाम से संबोधित करते हुए युवाशक्ति में पोवारी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने का एक स्वर्णिम सपना जगाया गया और समाज में पोवारी साहित्य की बहार लाई गयी। इसी सफल प्रयास का नाम हैं- “पोवारी भाषिक क्रांति!”
🔷२. भाषिक क्रांति की फलश्रुति
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ईस्वी सन् २०१८ में पोवारी भाषिक क्रांति सफल हुई। परिणामस्वरुप बड़े पैमाने पर पोवारी साहित्य का सृजन होने लगा। सुशिक्षित लोगों के बोलचाल में पोवारी भाषा पुनर्स्थापित होने लगी। पोवारी भाषा अपना एक नया उज्ज्वल इतिहास गढ़नें लगी।
पोवारी भाषा में झुंझुरका नामक ई- बाल पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यूटयूब पर पोवारी भाषा के विभिन्न व्हिडिओ की बाढ़ आ गयी। पोवार समुदाय के सार्वजनिक कार्यक्रमों की पत्रिका पोवारी भाषा में छपवाने का प्रचलन प्रारंभ हुआ, कार्यक्रमों का संचालन पोवारी भाषा में प्रारंभ हुआ, अतिथियों द्वारा मातृभाषा में भाषण देना प्रारंभ हुआ तथा मंचों पर बहुत गौरव के साथ पोवारी भाषा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति प्रारंभ हुई।
🔷३. पोवारी भाषा का भवितव्य
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पोवारी भाषिक क्रांति ने पोवार युवाशक्ति की भाषिक चेतना को उन्नत एवं धारदार बनाने का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया है। इससे अन्य भाषिक समुदाय के लोग भी प्रभावित एवं प्रेरित होते गये। परिणामस्वरुप हिन्दी एवं मराठी साहित्यिक मंचों पर पोवारी साहित्य एवं साहित्यिकों को प्रतिष्ठित स्थान मिलना प्रारंभ हुआ है।
भाषिक क्रांति के फलस्वरूप पोवार समुदाय की युवाशक्ति में पोवारी भाषा के प्रति फैलाई गयी दुर्भावना समूल नष्ट हो चुकी है और यह युवाशक्ति पोवारी भाषा के संरक्षण – संवर्धन – उन्नयन के लिए बड़े पैमाने पर दिन-रात प्रयत्नशील है। इस आधार पर निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि पोवारी भाषा पर छाये हुए संकट के बादल अब पूरी तरह हट चुकें हैं तथा पोवारी भाषा का भवितव्य उज्ज्वल है।

-ओ सी पटले
पोवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
गुरु ४/१/२०२४.
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