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पोवारी भाषा का समकालीन इतिहास एवं उसके उन्नयन के उपाय( ईस्वी सन् १९०५ से अब-तक) लेखक – इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

पोवारी भाषा का समकालीन इतिहास एवं उसके उन्नयन के उपाय !
( ईस्वी सन् १९०५ से अब-तक)
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लेखक -इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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♦️१. समकालीन इतिहास का अभिप्राय
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हम जिस युग में जी रहें होते है उस काल के इतिहास को समकालीन इतिहास कहा जाता है। भारत में उन्नीसवीं सदी को सुधारों की सदी के नाम से जाना जाता है सुधार युग के परिणामस्वरूप पोवार समाज ने १९०५ में जाति सुधारणी सभा नामक राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की ।अतः बीसवीं सदी के प्रारंभ (१९०५) से लेकर अब तक के पोवारी भाषा के इतिहास को “पोवारी भाषा का समकालीन इतिहास” के नाम से संबोधित किया जा सकता है।

♦️२. समकालीन इतिहास के कालखंड
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बीसवीं सदी के प्रारंभ से अब तक पोवारी भाषा के संबंध में समाज में जो सोच प्रबल रहीं है,उस आधार पर पोवारी भाषा के इतिहास को तीन कालखंड में विभाजित किया जा सकता है। यह तो
तीन प्रमुख कालखंड निम्नलिखित है।

🔷२-१: १९०५ से १९४७ का कालखंड
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पोवार समाज द्वारा १९०५ में जाति सुधारणी सभा की स्थापना हुई। १९१५ में बैहर के सिहारपाट में पोवार तीर्थ-स्थल के रुप में श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ। इसी वर्ष जाति सुधारणी सभा का राष्ट्रीय क्षत्रिय पंवार महासभा यह नया नामकरण किया गया।
इस समय से पोवार समाज के लिए पथ-प्रदर्शक साहित्य का सृजन होना प्रारम्भ हुआ। लेकिन यह सब साहित्य हिन्दी में ही प्रकाशित होते रहा। इस कालखंड में पोवार समाज के हर घर में पोवारी भाषा बोली जाती थी। शादियों के विविध दस्तूर के समय पोवारी गीत गाये जाते थे। शायद इसी कारण‌वश इस कालखंड में पोवारी भाषा के संवर्धन का विषय किसी की सोच में आया ही नहीं।
🔷२-२:१९४७ से२०१७ का कालखंड
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आज़ादी के पश्चात पोवार समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। शिक्षित लोगों के बोलचाल में हिन्दी का प्रचलन बढ़ा एवं पोवारी के सम्मुख अस्तित्व का संकट मंडराने लगा।
उपर्युक्त स्थिति में पोवारी भाषा यह बुद्धिजीवियों की चर्चा का विषय बन गया। कुछ कर्णधारों ने पोवारी भाषा का त्याग करके मातृभाषा के रुप में हिन्दी को अपनाने का आवाहन किया। इसके विपरित कुछ बुद्धिजीवियों ने पोवारी भाषा के संरक्षण की ओर कदम बढ़ाया।
इस समय पोवारी भाषा में साहित्य सृजन करने वालों में यादोरावजी राहांगडाले ( गोंदिया), हीरालाल बिसेन (नागपुर), अॅड. मनराज पटले ( साकोली) एवं जयपालसिंह पटले ( वारासिवनी) इनका नाम उल्लेखनीय है।
इस कालखंड में एक ओर पोवारी भाषा के लिखित साहित्य का सृजन हुआ तो दूसरी ओर मातृभाषा पोवारी को गलत दिशा में मोड़ने का, उसे हेंगली भाषा के रुप में बदनाम करने का तथा पोवारी के नाम पर समाज की आन -बान शान के खिलाफ साहित्य को अपनी किताबों में स्थान देने का अविवेकपूर्ण कार्य भी संपन्न हुआ।
‌‌इस कालखंड में जहां एक ओर पोवार की टूरी, बाई मोरों नवरा जमादार से, पटील की टूरी पराय गयी आदि. लांच्छनास्पद कैसेट्स का निर्माण किया गया वहां दूसरी ओर शादी के दस्तूर के गीत के नाम पर “बजाव रे होल्या बाजा, तोला पोवार की टूरी देबी!” इस प्रकार के मुर्खतापूर्ण गीत भी अपनी किताबों में प्रकाशित किये गये। यह सब कृत्य अत्यंत खेदजनक था।
इसी कालखंड में मातृभाषा पोवारी( Powari )के ऐतिहासिक नाम के स्थान पर पवारी ( Pawari) यह गलत नाम प्रतिस्थापित कर पोवारी भाषा की पहचान मिटाने का एवं उसे नष्ट करने का षड़यंत्र भी किया गया। इस समग्र पार्श्वभूमी से व्यथित होने के कारण २०१८ में पोवारी भाषिक क्रांति का प्रारंभ हुआ।

🔷२-३. भाषिक क्रांति (२०१८) से अबतक
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पोवारी भाषिक क्रांति ने युवाशक्ति में मातृभाषा पोवारी के प्रति प्रेम जगाया तथा उसके सम्मुख पोवारी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने का लक्ष्य रखा। परिणामस्वरुप समाज की युवाशक्ति मातृभाषा पोवारी के संरक्षण – संवर्धन के लिए पूर्ण उत्साह के साथ आगे आई। इस कारण २०१८ के पहले जहां पोवारी साहित्यिकों की संख्या चार -पांच तक सीमित थी वह संख्या अब लगभग १०० तक पहुंच गयी है। उसी प्रकार पहले पोवारी में प्रकाशित किताबों की संख्या जहां केवल १०-१२ तक सीमित थी, वहां अब यह संख्या लगभग ७० तक पहुंच चुकी है। तात्पर्य, पोवारी भाषा अब अपने अस्तित्व को गढ़ रहीं है।

♦️३. उज्ज्वल भवितव्य की आवश्यक शर्तें
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पोवारी भाषा के विकास के लिए संपूर्ण परिस्थिति अनुकूल है। लेकिन भाषा के विकास के लिए पोवारी साहित्यिकों ने “भाषा के अस्तित्व को गढ़ना”(Bhasha Ke Astitva Ko Gadhana) इस संकल्पना का अभिप्राय अवगत करना, आत्मसात करना एवं साहित्य सृजन करते समय भाषा को गढ़ने का‌ कार्य कुशलता पूर्वक करना आवश्यक है। इसलिए यहां निम्नलिखित मुद्दे के अंतर्गत “भाषा को गढ़ने का” अभिप्राय निरुपित करना आवश्यक है।

♦️४. भाषा को गढ़ना: अर्थ एवं व्याख्या
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भाषा को गढ़ने का अभिप्राय उदाहरण सहित निम्नलिखित है-
४-१. गढ़ना इस शब्द का अर्थ होता है संवारना, तरासना, आकार देना, रुप देना, सरजना, सिरजना, सुड़ौल करना, निखारना आदि.
४-२. सुनार जब सोने के आभूषण बनाता है, तब उसे आभूषण गढ़ना कहा जाता है।
साहित्यिक जब साहित्य का सृजन करता है, तब इस प्रक्रिया को साहित्य गढ़ना कहा जाता है।
४-३. साहित्य का सृजन करते समय साहित्यिक अपनी भाषा को संवारता है, निखारता है। इस प्रक्रिया में साहित्यिक भाषा को गढ़ रहा होता है।

♦️५. पोवारी भाषा का उज्ज्वल भवितव्य
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भारत में अनेक बोली- भाषा है। वैश्वीकरण के इस युग में छोटे समुदाय द्वारा बोली जानेवाली भाषाओं के सम्मुख अस्तित्व का संकट उपस्थित है। जहां अनेक संकटापन्न भाषाओं के आप्लावित स्वर हमें आज चिंतित करते है,‌ वहां पोवारी भाषिक क्रांति का आल्हादकारी स्वर न केवल पोवारी भाषिक समुदाय में बल्कि हिन्दी और मराठी भाषिक समुदायों में भी नयी आशा पल्लवित कर रहा है। हिन्दी और मराठी साहित्यिक मंचों की आंखें पोवारी भाषिक क्रांति की ओर लगी हुई है तथा ‌वें भी पोवारी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दे रहे है।
पोवारी भाषा के उन्नयन के लिए अब संपूर्ण परिस्थिति अनुकूल है। इस परिस्थिति में पोवारी भाषा के उन्नयन के लिए पोवारी साहित्यिकों ने पोवारी भाषा के समकालीन इतिहास को जान लेना, बड़े पैमाने पर पोवारी साहित्य का सृजन करना एवं साहित्य सृजन करते समय पोवारी भाषा को संवारने की, उसे सुडौल करने की अथवा उसे गढ़ने की जिम्मेदारी का निर्वाह करना परम् आवश्यक है।

-ओ सी पटले
पोवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
रवि. ७/१/२०२४.
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