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पोवारी भाषा के उत्कर्ष की आधारशिला है –“पोवारी भाषिक क्रांति!” (२०१८ और उसके पश्चात का कालखंड) -इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

पोवारी भाषा के उत्कर्ष की आधारशिला है –“पोवारी भाषिक क्रांति!”
(२०१८ और उसके पश्चात का कालखंड)

-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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♦️ पोवारी भाषा के उत्कर्ष के लिए २०१८ में एक क्रांतिकारी अभियान प्रारंभ किया गया। इस अभियान द्वारा युवाशक्ति में जागृत किये गये भाषिक प्रेम एवं उनके बुलंद हौसलों के कारण पोवारी भाषा का उत्कर्ष प्रारंभ हुआ है। यह योगा-योग है कि U.N.O.द्वारा २०२२-३२ इस कालखंड में स्थानीय भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय दशक मनाया जा रहा है।
♦️ पोवारी भाषा के उत्कर्ष में बुद्धिजीवियों का प्रचंड सहभाग है । वर्तमान में हर पोवारी साहित्यिक पोवारी भाषा के उत्कर्ष के लिए हर्षित, उमंगित एवं समर्पित है।
♦️नयी -नयी पुस्तक, नये – नये गाने, नयी -नयी पोवारी काॅमेडी लाॅन्च हो रही है। पोवारी भाषा एवं साहित्य के संवर्धन पर गोष्ठियां आयोजित हो रहीं है। आकर्षक एवं रोचक पोवारी बाल-साहित्य का प्रकाशन हो रहा है।
♦️ पोवारी साहित्यिक नयी- नयी कल्पना से नये – नये साहित्य का सृजन कर रहा है और हर कलाकार डिजिटल माध्यम में पोवारी भाषा का प्रचार- प्रसार करने में स्वयं को धन्य महसूस कर रहा है।
♦️१.उत्कर्ष का स्वर्णिम कालखंड
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पोवारी भाषा का विकास २०१८ की भाषिक क्रांति के पश्चात अत्यंत तेज गति से हो रहा है। दिन-रात पोवारी साहित्यिक विभिन्न विधाओं में रचनाओं का सृजन करके उन्हें डिजिटल माध्यमों में एवं हार्ड कापी के रुप में प्रकाशित कर रहें है। कोई लिखित साहित्य प्रकाशित कर रहा है, कोई यू ट्यूब पर गीत प्रकाशित कर रहे है तो कोई पोवारी काॅमेडी व्हिडिओ पेश कर रहा है। ऐसा लगता है मानो पोवारी भाषा के प्रचार -प्रसार की चारों तरफ बाढ़ आ गई है। वर्तमान कालखंड यह पोवारी भाषा के उत्कर्ष का स्वर्णिम कालखंड है।
♦️२. अभुतपूर्व क्रांतिकारी बदलाव
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पोवारी भाषा के हजारों वर्ष के इतिहास में भाषा का नैसर्गिक विकास होता रहा। लेकिन आज़ादी के पश्चात विविध कारणों से पोवारी भाषा के सम्मुख अस्तित्व का संकट उपस्थित हुआ और उसके संरक्षण की आवश्यकता उत्पन्न हुयी। परिणामस्वरुप दो चार व्यक्तियों ने पोवारी साहित्य के सृजन पर लक्ष्य केंद्रित किया। लेकिन यह बात आत्म-विश्वास के साथ कहीं जा सकती है कि २०१८ से पोवारी भाषा के संरक्षण – संवर्धन के लिए जितने बड़े पैमाने पर सभी उत्साहपूर्वक प्रयास कर रहे हैं, ऐसा अद्भुत प्रयास इसके पहले कभी नहीं किया गया।
♦️३. क्रांतिकारी बदलाव के कारण
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पोवार समाज में मातृभाषा पोवारी के प्रति सोच में जो क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलता है,‌उसके प्रमुख कारण निम्नलिखित है –
🔷३-१. भाषिक स्वाभिमान
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पोवार समाज के हर व्यक्ति में मातृभाषा के प्रति प्रेम और स्वाभिमान सुप्त अवस्था में था। पोवार समाज की युवाशक्ति में भी मातृभाषा के प्रति असाधारण लगाव था। परंतु समाज के ही कुछ तथाकथित कर्णधारों ने पूरे समाज में मातृभाषा पोवारी के प्रति नकारात्मक एवं तिरस्कार के भाव पैदा किए थे। यह कार्य आज़ादी के पश्चात अविरत ७० वर्षों तक चलता रहा। इसलिए मातृभाषा पोवारी का विकास अवरूद्ध हुआ एवं उसकी अवनति हुई।
लेकिन पोवार समाज के आम जनमानस में ‌ मातृभाषा पोवारी के प्रति अटूट प्रेम कायम था। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए २०१८ में पोवारी भाषिक क्रांति का शंखनाद किया गया। युवाशक्ति में मातृभाषा के प्रेम और स्वाभिमान को जागृत किया गया। प्रेम एक शक्ति है , इसलिए युवाशक्ति में मातृभाषा के प्रति प्रेम जागृत होते ही उसके उत्थान के लिए व्यापक प्रयास प्रारम्भ हुए और देखते ही देखते इन प्रयासों को जनांदोलन का स्वरूप प्राप्त हो गया ।
🔷३-२. मातृभाषा के प्रति आत्मीयता
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समाज के कुछ कर्णधारों ने मातृभाषा पोवारी के गुण, कार्य , उपयोगिता, महत्व आदि. ज्ञान का अभाव, मातृभाषा का उत्कर्ष करने की इच्छाशक्ति का अभाव, भाषा का उत्कर्ष करने की क्षमता का अभाव आदि कारणों से पोवारी भाषा के प्रति समाज में तिरस्कार के भाव उत्पन्न किये थे।
लेकिन २०१८ की पोवारी भाषिक क्रांति ने समाज की युवाशक्ति में मातृभाषा के प्रति लगाव उत्पन्न करने में पूर्ण सफलता हासिल की। भाषिक क्रांति ने समाज की युवाशक्ति में मातृभाषा के प्रति लगाव , आकर्षण एवं उसके उत्कर्ष के प्रति अनुकूल भाव उत्पन्न करने का कार्य प्रभावशाली ढंग से किया। इसलिए समाज की मातृभाषा के प्रति सोच में क्रांतिकारी बदलाव आया।
♦️४. पोवारी साहित्य की बाढ़
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युवाशक्ति में मातृभाषा के प्रति प्रेम एवं स्वाभिमान जागृत होते ही हमारी जो युवाशक्ति हिन्दी, मराठी अथवा झाड़ी-बोली साहित्य सृजन में लगी हुई थी वह पोवारी साहित्य सृजन की ओर मुड़ गयी और साहित्य सृजन करने लगी। इस बदलाव के कारण पोवार समुदाय में अनेक नवोदित साहित्यिकों का भी उदय हुआ। अतः २०१८ के पहले जहां पोवारी साहित्यिकों की संख्या केवल ४-५ तक सीमित थी, वहां यह संख्या लगभग १०० तक पहुंच गई। विगत छह वर्षों में पोवारी साहित्यिकों द्वारा लगभग ५० किताबें प्रकाशित हुई है। सभी साहित्यिक मातृभाषा के प्रति प्रेम से ओतप्रोत है। मातृभाषा की सेवा में वें पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं। इसलिए वर्तमान में पोवारी भाषा एवं साहित्य के स्वर्णयुग के आगमन की अनुभूति हो रही है।
♦️५. डिजिटल माध्यमों का योगदान
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वर्तमान युग डिजिटल युग है। पोवारी भाषा के नव- सृजित साहित्य के प्रचार-प्रसार को नये प्रचार माध्यमों का साथ मिलने से पोवारी साहित्यिकों का उत्साह बढ़ा। इस कारण वें पूर्ण उल्लास के साथ दिन -रात पोवारी साहित्य के सृजन में जूट गये। परिणामस्वरुप पोवारी भाषा में विविध विधाओं का साहित्य सृजन होने लगा और आश्चर्यजनक गति से पोवार समाज में पोवारी भाषा एवं साहित्य के स्वर्णयुग जैसी परिस्थिति के दर्शन हो रहें है।
♦️६. विविध साहित्यिक मंचों का योगदान
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संकटग्रस्त पोवारी भाषा के पुनरुत्थान के लिए जब पोवारी साहित्यिक जूट गये तब हिन्दी एवं मराठी साहित्यिकों ने पोवारी साहित्य एवं साहित्यिकों को अपने-अपने मंचो पर स्थान देने में क्षणिक भी विलंब नहीं किया। इससे पोवारी साहित्यिकों का हौंसला बढ़ा और पोवारी भाषा के उज्ज्वल भवितव्य का सबको एहसास हो गया। हिन्दी एवं मराठी साहित्यिक पत्रिकाओं एवं मंचों का सहयोग भी पोवारी भाषा और साहित्य के उत्कर्ष के लिए बहुत सहायक साबित हो रहा है।
♦️७. युवाशक्ति का उत्साह
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मातृभाषा पोवारी के संरक्षण, संवर्धन एवं उसे पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए पोवार समाज की युवाशक्ति ने जो तत्परता दिखाई तथा मातृभाषा की सेवा का भाव मन में संजोए हुए वें जिस उमंग – उल्लास के साथ पोवारी साहित्य के सृजन में जुटे हुए हैं तथा समय का भान भूलकर अविरत परिश्रम कर रहें है, यह परिदृश्य पोवारी भाषा के समग्र इतिहास में एक मिसाल है। इसे देखकर न केवल पोवार समुदाय आनंदित है, बल्कि अनेक हिन्दी एवं मराठी साहित्यिकों में भी खुशी का माहौल है। पोवारी भाषा एवं साहित्य का उत्कर्ष होते देखकर साहित्य जगत हर्षित है।
♦️८.पोवारी भाषा का भवितव्य
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पोवारी भाषा समाज के कुछ कर्णधारों की ग़लत नीति के कारण उपेक्षा की शिकार हुई थी। परिणामस्वरुप पोवारी भाषा का साहित्य विकसित नहीं हो सका और यह भाषा नयी पीढ़ी के बीच चलन से बाहर होने लगी और संकटग्रस्त स्थिति में पहुंची। लेकिन आज भी पोवार समुदाय की लगभग १५ लाख है। २०११ की जनगणना के अनुसार पोवारी बोलने वालों की जनसंख्या ३,२५,७ ७२ है। ग्रामीण अंचल के एवं कम शिक्षित लोगो ने ही पोवारी को जीवंत रखा है। पोवारी जनमानस में मातृभाषा पोवारी के प्रति लगाव है। अतः पोवारी भाषा के उत्कर्ष का कार्य प्रभावी रुप से किया जा सकता है।
पोवारी भाषिक क्रांति के कारण हमारी युवाशक्ति एवं बुद्धिजीवी वर्ग अब मातृभाषा की अहमियत को पूरी तरह समझ गया है तथा उसके उत्थान को प्राथमिकता दे रहा है। साहित्य सम्मेलनों के माध्यम से पोवारी भाषा एवं साहित्य के विकास को नई उर्जा एवं नई गति देने का कार्य प्रभावी रुप से किया जा रहा है। तात्पर्य, वर्तमान समय में पोवारी भाषा का बोलचाल , साहित्य , सामाजिक कार्यक्रम, एवम् डिजिटल माध्यमों में जो प्रयोग एवं उत्कर्ष दिखाई दे रहा है, इसकी आधारशिला पोवारी भाषिक क्रांति द्वारा ही रची गई है।

-ओ सी पटले
पोवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
बुध.१७/१/२०२४.
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