स्वतंत्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना ही पोवार समाज के अस्तित्व की बुनियाद है ! – इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

0
14
1

स्वतंत्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना ही पोवार समाज के अस्तित्व की बुनियाद है!
-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
——————————————–
♦️ चेतना के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय आदि विविध स्तर पाये जाते है।
♦️ जातिप्रथा भारत की एक प्रमुख विशेषता है। जातिप्रथा के कारण भारत में भाषिक एवं सांस्कृतिक विविधता के दर्शन होते है।
♦️ स्वतंत्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना ही प्रत्येक जाति समुदाय की विशेषता एवं बुनियाद भी है। प्रस्तुत लेख सिर्फ वैनगंंगा अंचल के ३६ कुलीय पोवार समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के विश्लेषण तक मर्यादित है।
१.स्वतंत्र सामाजिक चेतना
————————————
प्रत्येक व्यक्ति की अपने समुदाय का ऐतिहासिक नाम, वंश, अतीत एवं वर्तमान में उसका निवास आदि. विषयों में दिलचस्पी होनी चाहिए । इस प्रकार की जानकारी से अवगत होने को स्वतंत्र सामाजिक चेतना कहा जाता है।
२. स्वतंत्र सांस्कृतिक चेतना
————————————-
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा, संस्कृति, परंपराएं, रीति-रिवाज, धर्म, आराध्य देवी – देवता आदि. की जानकारी अवगत होनी चाहिए। यह जानकारी अवगत होने को स्वतंत्र सांस्कृतिक चेतना के नाम से संबोधित किया जाता है।
३. समग्र पोवारी चेतना
———————————–
उपर्युक्त दोनों प्रकार की चेतना के कारण पोवार समाज में आत्मीयता, प्रेम-भाव रहता हैं तथा समाज संगठित रहता है। इसलिए दोनों प्रकार की चेतना को सम्मिलित रुप से समग्र पोवारी चेतना के नाम से संबोधित किया जा सकता है।पोवार समाज में सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को सही दिशा में आगे बढ़ाने से ३६ कुल पोवार समाज का स्वतंत्र अस्तित्व कायम रहेगा। लेकिन विगत अनेक वर्षों से पोवारी चेतना को उपेक्षित कर उसे नष्ट करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
४. समग्र पोवारी चेतना की उपेक्षा (१९६५-२०१७)
———————————————-
पोवार समाज में १९०५ में राष्ट्रीय क्षत्रिय पंवार संगठन की स्थापना की गयी थी।‌ १९१५ में सिहारपाठ बैहर में श्रीराम मंदिर का निर्माण किया गया और इसे पोवार समाज तीर्थ-स्थल का नाम दिया गया। आज़ादी के आस-पास के समय में समाज को शिक्षा की धारा में लाने के लिए जी-जान से प्रयास किया गया। शहरों में छात्रावास बनाये गये। वर्तमान शिक्षित पोवार समाज उनकी दूरदृष्टी,मार्गदर्शन एवं प्रयास की देन है।
उपर्युक्त महासभा ने लगभग १९६५ तक समग्र पोवारी चेतना के सही दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य किया । लेकिन १९६५ से २०१७ तक यानी लगभग ५० वर्षो तक समाज के कुछ तथाकथित कर्णधारों ने समाज की चेतना को गलत दिशा में मोड़ने का कार्य किया। उनका यह अनुचित कार्य निम्नानुसार है-
४-१.सामाजिक चेतना को ग़लत दिशा
————————————————
पोवार समाज ( Powar Community ) के कुछ तथाकथित कर्णधारों ने १९६५ में ‌पोवार (Powar ) एवं भोयर ( Bhoyar ) इन दो जातियों को एक जाति घोषित किया।१९८२ से दोनों जातियों के नामों के स्थान पर पवार (Pawar) यह एकही नाम प्रतिस्थापित करने का कार्य प्रारंभ किया। इसकारण पोवार समाज की युवाशक्ति अपने जाति नाम के प्रति दिग्भ्रमित हो गयी। इस नीति के कारण समाज में सही जाति नाम लिखने के प्रति लापरवाही पनपी। कुछ व्यक्तियों ने पोवार (Powar )इस सही नाम के स्थान पर पवार (Pawar ) यह गलत नाम लिखना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार सामाजिक चेतना भ्रमित हो गयी एवं गलत दिशा में मुड़ गयी। सामाजिक एकता के लिए यह स्थिति हानिकारक थी।
४-२.सांस्कृतिक चेतना को ग़लत दिशा
—————————————————
समाज के कर्णधारों द्वारा समाज की मातृभाषा एवं संस्कृति के संरक्षण -संवर्धन का कार्य किया जाना चाहिए। क्योंकि यह उनका दायित्व है। लेकिन १९८२ से उन्होंने मातृभाषा पोवारी (Powari )इस सही नाम के स्थान पर पवारी‌ (Pawari )यह गलत नाम प्रतिस्थापित कर दिया। इससे हमारी युवाशक्ति मातृभाषा के ऐतिहासिक नाम के प्रति दिग्भ्रमित हुई। कुछ व्यक्तियों ने मातृभाषा का नाम गलत तरीके से लिखना प्रारम्भ कर दिया था। यह स्थिति मातृभाषा पोवारी एवं पोवारी संस्कृति के संरक्षण – संवर्धन की दृष्टि से काफी असंतोषजनक, चिंतनीय एवं दु:खदायी थी।
५. समग्र पोवारी क्रांति अभियान (२०१८)
————————————————-
समाज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को ग़लत दिशा में मोड़ देने के कारण समाज की ऐतिहासिक पहचान, मातृभाषा पोवारी , पोवारी संस्कृति एवं समाज के स्वतंत्र अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे। यह स्थिति असह्य हो जाने के कारण समग्र पोवारी चेतना को सही दिशा देने के उद्देश्य से २०१८ में “पोवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान” तथा ” पोवार समाज विश्व आमूलाग्र क्रांति अभियान” नामक दो अभियान एकसाथ प्रारंभ किये गये। इन्हें सम्मिलित रुप से “समग्र पोवारी क्रांति अभियान” के नाम से जाना जाता है।
६. समग्र क्रांति अभियान के कार्य
————————————-
उपर्युक्त अभियान के द्वारा भटकी हुई समग्र पोवारी चेतना को सही दिशा देने का कार्य प्रारंभ किया गया।इस अभियान के द्वारा जिन विचारों का प्रचार -प्रसार किया गया वें विचार निम्नलिखित है –
६-१. मूल नामों का प्रचार
————————————
छत्तीस कुल पोवार समाज एवं मातृभाषा का सही नाम पोवार/पोवारी है। हमारे ये नाम ही हमारी पहचान है। समाज एवं मातृभाषा का स्वतंत्र अस्तित्व कायम रखने के लिए हमें इन मूल नामों का संरक्षण करना चाहिए, इसका बोध समाज की युवाशक्ति को कराया गया।
६-२. आराध्य प्रभु राम का प्रचार
———————————————
पोवार समाज के कर्णधारों ने हमारे समाज के प्रथम आराध्य प्रभु श्रीराम को दरकिनार करने का कार्य प्रारंभ किया था। अतः हमने मजबूत तथ्यों के साथ प्रभु श्रीराम ही हमारे प्रथम आराध्य है,‌इस सच्चाई का प्रचार- प्रसार किया।
६-३. गौरवशाली इतिहास का प्रचार ———————————————–
पोवार समाज क्षत्रिय वंशीय है। पुरातन काल में समाज के पूर्वजों ने सैनिक , किलेदार , सेना-नायक, शासक के रुप में अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक निर्वहन करके कीर्ति हासिल की थी। यह समाज राजस्थान – मालवा का मूलनिवासी है तथा देवगढ़ के शासक बख्तबुलंद के शासनकाल में ईस्वी सन् १७००के आसपास वैनगंंगा अंचल में आकर स्थायी रुप से बस गया है। पोवार समाज का इतिहास गौरवशाली है इस इस बात भरपूर प्रचार -प्रसार करके समाज को वास्तविकता अवगत करायी गयी।
६-४. मातृभाषा के महत्व का प्रचार ———————————————
मातृभाषा पोवारी समाज की श्रेष्ठतम धरोहर है। पोवारी भाषा पोवारी संस्कृति की संवाहक एवं समाज की मुख्य पहचान है।
पोवार समाज एवं पोवारी संस्कृति के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए पोवारी भाषा का संरक्षण – संवर्धन एवं उन्नयन आवश्यक है। यह सच्चाई प्रचार -प्रसार के माध्यम से समाज को अवगत करायी गयी।
६-५. भाषा संवर्धन के उपायों का प्रचार
———————————————–
मातृभाषा पोवारी के संवर्धन एवं उन्नयन के लिए पोवारी साहित्य का सृजन बड़े पैमाने पर होना आवश्यक है, यह भाव युवाशक्ति में विकसित किया गया। उसीप्रकार हमारी नयी पीढ़ी मातृभाषा पोवारी की संवाहक है। मातृभाषा के जतन के लिए उसे नयी पीढ़ी के बीच चलन में लाना परम् आवश्यक है, इस वास्तविकता का बोध भी समाज को कराया गया।
६-६. मातृभाषा विकास के लाभ का प्रचार
—————————————————–
पोवारी के उत्कर्ष से समाज में साहित्य एवं कला का सहज विकास होगा। समाज में साहित्यिक एवं कलाकारों का एक नया वर्ग उदित होगा । इससे समाज का वैचारिक विकास होगा और समाज की प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी इस सच्चाई की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया गया । उसी प्रकार
पोवारी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने से मातृभाषा पोवारी एवं पोवार समाज इन दोनों की प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। इस तथ्य का प्रचार करते हुए युवाशक्ति में पोवारी बोली को भाषा के श्रेणी तक विकसित करने की आकांक्षा जगायी गयी।
६-७. धार्मिक अधिष्ठान का प्रचार
——————————————
पोवारी संस्कृति को सनातन हिन्दू धर्म का अधिष्ठान प्राप्त है। सनातन धर्म ही पोवारी संस्कृति एवं संस्कारों का प्राणतत्व है । पुरातन काल से सनातन हिन्दू धर्म एवं पोवार समाज का अटूट संबंध है। इस संबंध में पोवार समाज की सांस्कृतिक श्रेष्ठता निहित है। इसलिए सनातन हिन्दू धर्म के हितों का संरक्षण करना यह पोवार समाज के हर सदस्य का बुनियादी दायित्व है। इस सच्चाई का बोध भी समाज की युवाशक्ति को कराया गया।
६-८.राष्ट्र के महत्व का प्रचार प्रसार
———————————————
राष्ट्रहित में ही समाजहित निहित है। इसलिए जातिय हित की अपेक्षा राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देना यह हमारा दायित्व है। यह सोच युवाशक्ति में विकसित की गयी।
तात्पर्य, ” समग्र पोवारी क्रांति अभियान के द्वारा हमने अपने समुदाय को गौरवशाली इतिहास, सामुदायिक भावना, मातृभाषा , संस्कृति , सनातन हिन्दू धर्म एवं राष्ट्र के महत्व का बोध कराया। इन सबके प्रति अटूट प्रेम , प्रखर निष्ठा एवं श्रद्धा के भाव जगाया।
७. क्रांति अभियान जनांदोलन में परिवर्तित ————————————————-
समाज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को सही दिशा देने के उद्देश्य से २०१८ में ” समग्र पोवारी क्रांति अभियान की शुरुआत यद्यपि अकेले व्यक्ति द्वारा प्रारंभ किये गये थी, लेकिन डिजिटल संचार माध्यम से हमारे समाजहितकारी विचारों का अविरत प्रचार -प्रसार होने के कारण इन विचारों पर युवाशक्ति का दृढ़ विश्वास ‌ प्रस्थापित होता गया और समग्र पोवारी क्रांति अभियान बहुत शीघ्र ही जनांदोलन में बदल गया। परिणामस्वरुप समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने पोवार समाज के शाश्वत हितों की रक्षा के उद्देश्य से ९ जून २०२२ को अखिल भारतीय क्षत्रिय पोवार (पंवार) महासंघ की स्थापना की।
८.निष्कर्ष एवं सुझाव
—————————
अब अखिल भारतीय क्षत्रिय पोवार (पंवार) महासंघ ३६ कुलीय क्षत्रिय पोवार समाज की ऐतिहासिक पहचान, मातृभाषा पोवारी, पोवारी संस्कृति एवं पोवार समाज के स्वतंत्र अस्तित्व को कायम रखते हुए समाजोत्थान के लिए प्रभावी रुप से कार्य कर रहा है। विगत ३ फरवरी को तुमसर नगरी में महासंघ का दूसरा अधिवेशन एवं चौथा साहित्य सम्मेलन प्रचंड उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इसमें महासंघ ने वैनगंंगा क्षेत्र के ३६ कुल पोवार समाज की एकता -अखंडता कायम रखते हुए उसके सर्वांगीण उत्थान का संकल्प दोहराया। तात्पर्य, महासंघ के नेतृत्व में समाज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को सही दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है और इसी में समाज का शाश्वत कल्याण समाहित है।
-ओ सी पटले
समग्र पोवारी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
मंग. १३/२/२०२४.
♦️