पोवार समाज की नयी पीढ़ी को युवा मार्गदर्शन के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक धारा से जोडना परम् आवश्यक…!

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पोवार समाज की नयी पीढ़ी को युवा मार्गदर्शन के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक धारा से जोडना परम् आवश्यक…! ————————————————-
पोवार समाज वैनगंगा अंचल में बसा हुआ है। मध्यप्रदेश के बालाघाट एवं सिवनी तथा महाराष्ट्र के गोंदिया एवं भंडारा ज़िले में इस समाज की घनी आबादी है। पोवार समाज क्षत्रिय वंशीय है और इस समाज के सुशिक्षित युवा डिजिटल संचार माध्यम में क्षत्रिय होने पर और पोवार होने पर गर्व व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं ।
पोवार समाज के परंपरागत विवाह गीतों से लगता है कि इस समाज की संस्कृति श्रेष्ठ है। यह समाज वर- वधू को राम एवं जानकी जी के स्वरूप में देखता है।
समाज के परंपरागत गीतों में बरातियों के लिए राजा रनिवास, वर के लिए राजकुंवर, वर के पिता के लिए राजा दशरथ, वधू के पिता के लिए राजा जनक यह शब्द प्रयोग देखने मिलता है।
पोवार समाज में ३६ कुल समाहित है। इसलिए इस समाज को ३६ कुलीय पोवार समाज के नाम से भी संबोधित किया जाता है।इस समाज में प्रत्येक कुल दूसरे कुल में विवाह संबंध प्रस्थापित करता है।
पोवार समाज के लोग अन्य समाज के लोगों के साथ घुल-मिल कर रहते है। दुसरे समाज के सुख-दुख में सहभागी होते है। सार्वजनिक कार्यों में अपना सहयोग देते है तथा तन – मन से सहभागी भी होते है।
पोवार समाज में कोई व्यक्ति हमेशा घुल-मिल कर रहता है और यदि गरीब है तों उसे समाज के लोग सामूहिक आर्थिक मदद भी करते है। दूसरों की मदद करना ये तों शायद पोवारों के ख़ून में ही है।
खेती-किसानी यह इस समाज का मुख्य व्यवसाय है। आधुनिक युग में इस समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। इस समाज ने शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर , वकील , इंजीनियर आदि व्यवसाय में भी अपनी आच्छी पैठ जमाई है।
पोवार समाज में सबकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है। गरीबों का प्रमाण भी काफी है। समाज के सामाजिक संगठन तो बहुत है लेकिन गरीबों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास बिल्कुल नहीं किया गया है।
पोवार समाज सनातन हिन्दू धर्म का अनुयाई है। लेकिन आज़ादी के पश्चात इस समाज पर धर्मनिरपेक्षतावादी, बहुजनवादी, वामपंथी आदि विचारधारा का भी गहरा प्रभाव पड़ा है। पाश्चात्यीकरण के प्रभाव से भी यह समाज अपने आप को बचा नहीं पाया। व्यक्तिवादी विचारधारा का भी इस समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
विभिन्न प्रभावों के कारण समाज की युवा पीढ़ी के कुछ लोगों में शराब का प्रचलन देखा जा रहा है। शादियों में संस्कारों की उपेक्षा की जा रही। नयी पीढ़ी में धार्मिक चेतना कम पायी जाती है। बहुत कम मात्रा में ही सही लेकिन धर्मांतरण के भी कुछ परिवार शिकार हो गये हैं। कुछ युवा – युवतियां अंतर्जातीय विवाह की पैरवी करते हुए भी पाये जाते है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि नयी पीढ़ी सनातन हिन्दू संस्कृति से अथवा अपनी परंपरागत पोवारी संस्कृति से दूर हो रही है। दूसरों की देखा-सिखी के कारण पोवार समाज की नई पीढ़ी अपने पुरानी संस्कृति – संस्कारों को छोड़कर आलग दिशा में भटक रहीं है। अतः युवा मार्गदर्शन की समाज में नितांत आवश्यकता है। युवा मार्गदर्शन के माध्यम से हमें आपनी युवाशक्ति को अपनी सांस्कृतिक विरासत,संस्कृति, संस्कार और अपनी जड़ों से जोड़ने की आवश्यकता है।
समाज में गरीब किसान एवं मजदूर वर्ग के लोगों को भी समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए सामाजिक संगठनों द्वारा प्रभावी रुप से कार्य करना आवश्यक है। नहीं तो यह समाज गरीब एवं धनवान इन दो वर्गों में बंटा हुआ दिखाई देगा और समाजोत्थान की संकल्पना केवल ऊपरी सतह पर ही रह जायेगी।

-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
शनि.१७/२/२०२४.
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