अंग्रेज विरुद्ध वीर राजे चिमना बहादुर का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम(1818) : कारण , स्वरुप एवं ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण

0
17
1

अंग्रेज विरुद्ध वीर राजे चिमना बहादुर का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम(1818) : कारण , स्वरुप एवं ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण
———————————————-
♦️ छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा प्रस्थापित हिंदवी स्वराज्य के अंतिम सेनापति परगने कामठा के वीर राजे चिमना बहादुर थे।
♦️ मराठा शासनकाल में परगने कामठा यह मध्य-भारत का सबसे समृद्धशाली, शक्तिशाली एवं विख्यात परगना था।
♦️ परगने कामठा में लगभग 20 जमींदारियां थी। वीर राजे चिमना बहादुर यह सब जमींदारों के सर्वोच्च जमींदार थे। इनकी राजधानी कामठा थी।
♦️ राजे चिमना बहादुर ने 1818में अंग्रेजों के खिलाफ किया गया युद्ध यह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम है । यह स्वतंत्रता संग्राम वैनगंंगा अंचल में लड़ा गया था। इसके मुख्य कारण एवं ऐतिहासिक परिणामों को परिभाषित करना यह इस लेख का मर्यादित उद्देश्य है।
1. अंग्रेजों का साम्राज्यवाद
————————————
अंग्रेजों ने अठारहवीं शताब्दी में प्लासी की लड़ाई (1757) एवं बक्सर की लड़ाई(1764) में जीत हासिल करके बंगाल,बिहार, उड़ीसा आदि प्रदेशों पर अधिकार प्रस्थापित कर लिया था। इसके पश्चात उनकी निगाह पुणे के पेशवा एवं नागपुर के भोंसले राजवंश के राज्य पर थी। परगने कामठा यह नागपुर राज्य के अंतर्गत था। कामठा के वीर राजे चिमना बहादुर यह भोंसले राजवंश एवं पेशवा बाजीराव द्वितीय के प्रति निष्ठावान थे।
2. पुणे का युद्ध (1817)
———————————–
मराठा शासक भोंसले, शिन्दे, होलकर, गायकवाड़ एवं पेशवा में पहले जैसी एकता नहीं थी। इसका लाभ उठाकर अंग्रेजों ने 1817 में पुणें में पेशवा बाजीराव द्वितीय के विरुद्ध युद्ध प्रारंभ किया। इस युद्ध में पेशवा पराजित हो गया। परिणामस्वरुप पुणें पर अंग्रेजों का वर्चस्व प्रस्थापित हो गया
3.नागपुर‌ का युद्ध (1817)
————————————–
पेशवा को पराजित करने के बाद नागपुर में अंग्रेजों द्वारा नियुक्त रेसिडेंट जेनकिन्स ने शासक आप्पासाहेब भोंसले के साथ विवाद उपस्थित कर उनके विरुद्ध युद्ध प्रारंभ कर दिया। यह युद्ध मराठों के इतिहास में नागपुर के युद्ध के नाम से विख्यात है।
रेसिडेंट जेनकिन्स ने साम – दाम -दण्ड -भेद का प्रयोग करके एवं अपने प्रचंड सैनिक सामर्थ्य का उपयोग करके मराठा सेना को पराजित कर दिया और नागपुर के भोंसले महल पर से जरी पटका के स्थान पर युनियेन जॅक फहरा दिया।
4. मराठों में असंतोष
——————————-
स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार “स्वतंत्रता सबको प्रिय होती है। हर व्यक्ति,हर प्राणी, जीव-जंतु , वनस्पति एवं श्रृष्टि का कण-कण स्वतंत्रता के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है।” यह बात मराठों के संबंध में भी सही है।
पराजय के कारण नागपुर राज्य के असंख्य मराठा अधिकारियों में तीव्र असंतोष फैल गया। गुलामी के कारण पेशवा बाजीराव एवं नागपुर के युवा राजा आप्पासाहेब भोंसले भी दुखी थे। उन दोनों पर पुनः अंग्रेजों से लड़ने के लिए देशभक्त अधिकारियों का दबाव आ रहा था।
5.मराठों की गुप्त योजना
———————————–
पुणे के पेशवा एवं नागपुर के आप्पासाहेब के बीच गुप्तचरों के माध्यम से समाचार का आदान-प्रदान शुरू था। इन दोनों शासकों ने गुप्त रुप से अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी का निर्णायक युद्ध शुरू करने की एक योजना बनाई।
6. आप्पासाहेब को नज़रकैद
————————————–
इस योजना के अनुसार दोनों शासकों ने चंद्रपुर में मिलने का एवं भावी योजना बनाने का तय हुआ। योजना के अनुसार पेशवा बाजीराव ने अपनी विश्वसनीय सेना लेकर पुणें से चंद्रपुर की दिशा में प्रस्थान किया। इस समय मराठों में गद्दारी भी पराकाष्ठा पर थी। अतः इस गुप्त योजना की भनक नागपुर के रेसिडेंट जेनकिन्स को लग गयी। अतः उसने अपनी सेना पेशवा का सामना करने भेज दिया और इधर आप्पासाहेब को नज़रकैद कर लिया।
7. आप्पासाहेब की जबलपुर के लिए रवानगी
——————————————-
रेसिडेंट ने नागपुर राज्य में बढ़ते हुए मराठा असंतोष के कारण आप्पासाहेब को जबलपुर की जेल में रखने के लिए रवानगी कर दी। इधर चंद्रपुर की दिशा में बढ़ते हुए पेशवा ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
अंग्रेज एवं पेशवा के बीच हुए समझौते के अनुसार पेशवा का अंग्रेजों से मानधन लेना एवं उत्तर में गंगा जी के किनारे ब्रम्हावर्त के महल में स्थाई रुप से रहना तय हुआ।
8.आप्पासाहेब का छुटकारा
————————————-
लेकिन आप्पासाहेब चुप बैठने वाले नहीं थे। जबलपुर ले जाते हुए जब अंग्रेज अधिकारियों ने एक रात का मुकाम जबलपुर के दक्षिण में स्थित रायचूर में किया था तब आप्पासाहेब ने अंग्रेजों को चकमा देकर वे अकेले सीधे पचमढ़ी पहुंचे।
9. आज़ादी के निर्णायक युद्ध की योजना
———————————————-
पचमढ़ी में आप्पासाहेब के प्रति निष्ठावान सब अधिकारी गुप्त रुप से आपस में मिले। आप्पासाहेब ने पचमढ़ी के ठाकुर मोहनसिंह, हरई के गोंड राजा चैनशाह, परगने कामठा के वीर राजे चिमना बहादुर आदि से मिलकर एवं नयी सेना संगठित की ओर अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी का निर्णायक युद्ध प्रारम्भ कर दिया।
10. एक-साथ दो क्षेत्र में युद्ध प्रारम्भ
————————————————
इस समय आज़ादी का यह युद्ध दो मोर्चों पर लड़ा गया। प्रथम क्षेत्र था पचमढ़ी एवं वैनगंंगा का अंचल यह दूसरा क्षेत्र था।
पचमढ़ी क्षेत्र में युद्ध का नेतृत्व स्वयं आप्पासाहेब ने किये। वैनगंगा अंचल में युद्ध का नेतृत्व परगने कामठा के वीर राजे चिमना बहादुर ने किया।
यह युद्ध 1818 की वर्षा ऋतु में लड़ा गया। इसमें दोनों मोर्चों पर भयंकर नरसंहार हुआ। अंततः अंग्रेजों ने आप्पासाहेब को पराजित कर दिया एवं चिमना बहादुर को एक रात को धोखे से क़ैद कर लिया । परिणामस्वरुप युद्ध समाप्त हुआ। इस युद्ध को आजादी के प्रथम युद्ध के नाम से जाना जाता है।
11.ऐतिहासिक महत्व
——————————–
आप्पासाहेब भोंसले एवं वीर राजे चिमना बहादुर दोनों पराजित हुए। इस परिप्रेक्ष्य में प्रश्न उठता है कि क्या इन दोनों का यह प्रयास सार्थक था अथवा निरर्थक था? इस संबंध में प्रस्तुत लेखक का अभिमत निम्नलिखित है –
(1. )इस युद्ध की आग पेशवा बाजीराव द्वितीय के दिल में प्रज्ज्वलित थी। उनके ब्रम्हावर्त के महल में महारानी लक्ष्मीबाई का बचपन बीता। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ही तात्या टोपे और महारानी लक्ष्मीबाई में आज़ादी की प्रेरणा के बीज बोये थे। तात्पर्य, 1857 में हुए राष्ट्रीय संग्राम के बीज 1818 के युद्ध द्वारा ही बोये गये थे। अतः इस युद्ध का महत्व निर्विवाद है।
(2. )आज़ादी के लिए किये गये 1818 एवं 1857 के दोनों युद्ध विफल हुए। लेकिन इन्हीं युद्धों की ज्योति से आज़ादी की आग आगे बढ़ते गयी। यह आग आगे चलकर सुभाष चन्द्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव आदि क्रांतिकारियों एवं महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये स्वतंत्रता आंदोलन के रुप में दावानल का स्वरूप धारण कर ली। परिणामस्वरुप 15 अगस्त 1947 को भारतवर्ष को आजादी प्राप्त हुई।
(3.) अंग्रेजी में एक कहावत हैं कि पत्थर यद्यपि अंतिम आघात से टूटा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पहला आघात निरर्थक था।( The Stone is Broken by the Last Stroke it doesn’t mean that the First Stroke was Useless.) इसी न्याय के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा प्रस्थापित हिंदवी स्वराज्य की रक्षा के लिए वीर राजे चिमना बहादुर एवं आप्पासाहेब भोंसले के नेतृत्व में किया गया अंतिम युद्ध, इस युद्ध का प्रयास तथा इस युद्ध में जिनका बलिदान हुआ वह पूर्णतया सार्थक, महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायक है ।
– इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
सोम.19/2/2024.
———————————————–
♦️♦️♦️