पोवार समाज के कार्यक्रमों में मैं “राम” को खोजता हूं…! – इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

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पोवार समाज के कार्यक्रमों में मैं “राम” को खोजता हूं…!
-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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♦️ पोवार समाज के प्रथम आराध्य प्रभु श्रीराम है। पोवार समाज के विवाह गीतों में प्रभु श्रीराम, माता जानकी , राजा जनक,राजा दशरथ एवं रघुकुल के प्रति अगाध निष्ठा ध्वनित होती है।
♦️ वैनगंगा अंचल के पोवार बहुल गांवों में भव्य श्रीराम मंदिर एवं हनुमान मंदिर अवश्य पाये जाते हैं। पोवार समाज के व्यक्ति राममंदिर के व्यवस्थापक मंडल में रहकर महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हुए पाये जाते है।
♦️ पोवार समाज में परस्पर मुलाकात के समय “राम राम” लेने की तथा बिदा होते समय “जयराम जी की” कहने की परंपरा अस्तित्व में थी। आज भी ग्रामीण अंचल में यह परंपरा अस्तित्व में है।
१. राजाभोज जयंती का प्रचलन
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पोवार समाज के कर्णधारों ने ईस्वी सन् १९९३ में समाज के सामने चक्रवर्ती राजा भोज का आदर्श प्रस्तुत किया। इसके बाद समाज को अवगत कराया गया कि पोवार जाति की उत्पत्ति परमार वंश से हुई है तथा महाराजा भोज यह परमार वंश के एक महान शासक हुए है। इस कारण पोवार समाज ने महाराजा भोज को सर -आंखों पर रखा एवं ‌२००६ से बसंत पंचमी को राजाभोज जयंती धूमधाम से मनाने का प्रचलन प्रारंभ हुआ। गांव – गांव में महाराजा भोज की प्रतिमाएं स्थापित होना प्रारम्भ हुआ।
२.राजाभोज का आदर्श
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पोवार समाज के सम्मुख राजा भोज का आदर्श प्रस्तुत करने के कारण युवाओं को अवगत हुआ कि उनकी जाति की उत्पत्ति क्षत्रिय राजपूत में निहित परमार वंश से हुई है । इससे युवाओं में जातिय श्रेष्ठत्व का भाव एवं वांशिक स्वाभिमान जागृत हुआ। इस भाव के कारण उनमें विकास की एक उंची तमन्ना एवं किसी भी क्षेत्र में उंचाई हासिल करने का नया उत्साह एवं आत्मविश्वास भी जागृत हुआ।
समाज ने राजाभोज को अपना मान लेने के कारण युवाओं में राजाभोज का एवं अपनी जाति का इतिहास जानने की, उसमें संशोधन करने की एवं साहित्य सर्जन की प्रवृत्ति विकसित हुई। इन सब बातों के कारण युवाशक्ति को आत्मिक संतुष्टि प्राप्त होने लगी एवं ये बातें उनके बौद्धिक विकास में भी सहय्यक साबित हो रही है।
३.सामाजिक कार्यक्रमों का स्वरूप
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ईस्वी सन् २००६ से पोवार समाज के वार्षिक अधिवेशन एवं राजाभोज जयंती कार्यक्रम में संपूर्ण वातावरण भोजमय दिखाई देता है। उस समय बेहद खुशी होती हैं लेकिन दूसरी ओर कुछ विचार भी मन मे कोलाहल करते हैं। प्रस्तुत लेखक की जो मनःस्थिति होती है, उसका चित्रण प्रस्तुत करती हुई दो पंक्तियां निम्नलिखित है –
सबके साथ मैं भोज पर खूब सोचता हूं।
लेकिन अकेला वहां राम को खोजता हूं।।
लेखक की उपरोक्त मन: स्थिति का कारण भी बहुत सशक्त है। कारण यह है कि सनातन हिन्दू धर्म यह पोवारी संस्कृति का मूल स्त्रोत है। पुरातन काल से इस समाज ने रामायण एवं भगवद्गीता को अपने आदर्श ग्रंथ एवं राम तथा कृष्ण को अपने आदर्श माना है। लेकिन अब पोवार समाज के कार्यक्रमों को देखकर ऐसी शंका उपस्थित होती है कि यह समाज राम एवं कृष्ण के अपने अलौकिक आदर्शों एवं सनातन हिन्दू धर्म को दरकिनार तो नहीं कर रहा है?
४. एक महत्वपूर्ण अनुभव
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‌‌ राम एवं कृष्ण यह सनातन हिन्दू धर्म के प्राणतत्व है। पोवार समाज के कार्यक्रमों में अब सनातन हिन्दू धर्म की जय-जयकार तथा राम एवं कृष्ण के नाम सुनाई देना भी दुर्लभ हो गया है। इस संबंध में हमारे समाज के और भी कुछ महानुभावों ने चिंता जताई। इसलिए यहां एक अनुभव कथन करने की इच्छा हो गयी। यह अनुभव निम्नांकित हैं –
शायद सब को अवगत होगा कि अग्रवाल समाज के संस्थापक अग्रसेन जी है। २०१८ में दिल्ली में तीन दिन अग्रसेन जी की कथा प्रवचन का कार्यक्रम था। तीनों दिन कार्यक्रम में हम उपस्थित थे।
अग्रसेन जी की कथा के कार्यक्रम में अग्रवाल समाज के व्यक्ति बीच- बीच में सनातन हिन्दू धर्म के सभी देवताओं का विविध प्रकार से आवाहन/ प्रार्थना / जय-जयकार आदि किया करता थे। तात्पर्य, अग्रवाल समाज ने समाज के संस्थापक को तो माना है लेकिन सनातन हिन्दू धर्म को दरकिनार नहीं किया है।
५.आत्मपरीक्षण की आवश्यकता
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उपर्युक्त कार्यक्रम के आलोक में हमें आज आत्मपरीक्षण करने की आवश्यकता है। आज़ादी के पश्चात वामपंथी, धर्मनिरपेक्षतावादी विचारों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। कालांतर में हमने नये आदर्श प्रस्तुत किए और शायद सनातन हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं को जो प्रतिष्ठा दी जानी आवश्यक थी, वह नहीं दी। सनातन हिन्दू धर्म को एक प्रकार से दरकिनार – सा कर दिया। यहां हम गलती कर गए ऐसा लगता है।
पोवारी संस्कृति के मातृभाषा पोवारी एवं सनातन हिन्दू धर्म ये दोनों बुनियादी तत्व है। हमारे सामाजिक कार्यक्रमों में दोनों बुनियादी तत्वों को केंद्रीय स्थान प्राप्त होना चाहिए। प्रस्तुत लेखक तो “समाज के कार्यक्रमों में राम को खोजते रहता हैं एवं भविष्य में भी राम को निरंतर खोजते रहेगा।”
-ओ सी पटले
समग्र पोवारी चेतना एवं सामूहिक क्रांति अभियान, भारतवर्ष.
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