हमारे ऐतिहासिक अनुसंधानों का इतिहास : स्वरुप, प्रेरक घटनाएं एवं महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत – इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

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♦️ नये वस्तुओं की खोज करना, पुरानी वस्तुओं एवं सिद्धांतों का पुनः परीक्षण करके नये तथ्य प्रकाशित करना , इसे ही अनुसंधान कहा जाता है।
♦️ वैनगंगा अंचल के परगने कामठा एवं पोवार समाज के इतिहास पर अंग्रेजों द्वारा लिखित विवरण उपलब्ध है। इन दोनों विषयों में हमारी रुचि होने के कारण उनके द्वारा प्रस्तुत विवरणों का पुनः परीक्षण हमें करना पड़ा।
♦️ अंग्रेज लेखक द्वारा दी गई जानकारी का आलोचनात्मक अध्ययन करना , नये तथ्यों एवं युक्तिवाद (Argument) के आधार पर उनके कथन को गलत साबित करना, तत्पश्चात नया विचार प्रस्तुत करना इस पद्धति का प्रयोग हमने अपने ऐतिहासिक अनुसंधानों में किया है। शोध की इस पद्धति को खंडन – मंडन पद्धति के नाम से संबोधित किया जा सकता है। इस प्रकार के संशोधन की ओर हम कब और कैसे मुड़े? इसका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना यह इस लेख का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

1. जलधारा का उल्टा प्रयोग :- शिक्षा शास्त्र में एम. एड. की उपाधि हमने 1975 में अर्जित की। उस समय एम. एड. में अनुसंधान पद्धति (Research Methodology) नामक एक विषय हुआ करता था। उसी प्रकार किसी एक विषय पर लघु शोध प्रबंध (Dissertation )प्रस्तुत करना पड़ता था। अध्यापन के लिए हमने समुद्री जलधारा (Ocean Currents) विषय लिया था। जलधारा क्षैतिज (Horizontal)बहती है। लेकिन भूगोल अध्यापन पद्धति की पुस्तक में जलधारा समझाने के लिए जो प्रयोग था, उसमें जलधारा को अनुलंब (Vertical) बहते हुए दिखाया गया था। संबंधित लेखक की ये गलती जब हमारे ध्यान में आने पर हमने उस गलती को उजागर करने के साथ – साथ एक ऐसा प्रयोग प्रस्तुत किया, जिसमें जलधारा को क्षैतिज बहते हुए दिखाया था। इसप्रकार के प्रयोग (Experiment) पर हमारा एक लेख पुणे एवं नागपुर की शैक्षणिक पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। इस अनुभव से हमें ये बात समझ में आ गयी कि जहां कोई गलती दिखाई देती हो, वहां अनुसंधान संभव होता है। इस प्रकार हमारे जीवन को अनुसंधान की एक नयी दिशा मिली।

2. “भवभूति” शोध ग्रंथ का प्रभाव :- डॉ. मिराशी के भवभूति नामक ग्रंथ का अध्ययन हमारे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना हैं। “भवभूति” एक शोध ग्रंथ है और महामहोपाध्याय डॉ व्ही व्ही मिराशी द्वारा लिखा गया है। इस ग्रंथ में डॉ मिराशी ने महाकवि भवभूति के इतिहास संबंधी प्रस्थापित मतों का खंडन करते हुए नये तथ्यों कै आधार पर शोध ग्रंथ लिखा है। विद्वत समाज द्वारा इस ग्रंथ को महत्वपूर्ण माना गया है।
उपर्युक्त ग्रंथ हमने ईस्वी सन् 2000 में पढ़ा एवं वहां प्रयोग की गयी खंडन- मंडन शोध पद्धति से बहुत प्रभावित हुए । इसके पश्चात जब हमने 2008 में ऐतिहासिक अनुसंधान की राह आपनायी तो खंडन -मंडन पद्धति हमारे अनुसंधान की एक अनिवार्य हिस्सा बन गई।

3.असीरगढ़ की यादगार घटना :- असीरगढ़ की एक घटना का हमारे अनुसंधान कार्य पर अमिट प्रभाव पड़ा।भारत में असीरगढ़ का किला प्रसिद्ध है। यह किला मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के उत्तर में केवल 20 कि.मी.दूरी पर हैं।इसे दक्षिण की कुंजी कहा जाता है। यह किला नर्मदा और ताप्ती नदी के बीच में सतपुड़ा पर्वत के ऊंचे शिखर पर बना हुआ है। यह 1100 मीटर लंबा तथा 600 मीटर चौड़ा है। दक्षिण पर शासन करने के लिए राजा लोग असीरगढ़ पर पहले अपना अधिकार प्रस्थापित किया करते थे।
अंग्रेजों ने 1817 में नागपुर राज्य पर अपना शासन प्रस्थापित कर लेने के कारण नागपुर के राजा आप्पासाहेब भोंसले ने अंग्रेजों के खिलाफ आज़ादी का युद्ध छेड़ दिया था। इस समय असीरगढ़ का किला ग्वालियर के दौलतराव सिंधिया के अधिकार में था। मालवा में कार्यरत अंग्रेज अधिकारी मालकम ने आप्पासाहेब असीरगढ़ में छिपा है ऐसा कहते हुए 1819 में इस किले पर आक्रमण की योजना बनाई।
इस समय यशवंतराव लाड़ असीरगढ़ का किलेदार था। ब्रिटिश सैन्य अधिकारी मालकन ने यशवंतराव को महाराजा दौलतराव सिंधिया का आदेश दिखाया , और कहा गया कि वह असीरगढ़ का किला अंग्रेजों के स्वाधीन कर दें। लेकिन यशवंतराव ने किला अंग्रेजों को नहीं सौंपा। अंग्रेजों को असीरगढ़ का किला लड़ाई करके जीतना पड़ा। इस घटना में यशवंतराव ने अंग्रेजों के प्रति अविश्वास प्रगट किया। उसकी इस भूमिका ने अंग्रेजों द्वारा लिखित विवरणों के प्रति हमारे मन में भी संदेह के बीज बोया।

4. यशवंतराव का ऐतिहासिक उत्तर :- असीरगढ़ का किला जीतने के पश्चात अंग्रेज सैन्य अधिकारी मालकन ने यशवंतराव से प्रेम पूर्वक पूंछा कि दौलतराव सिंधिया का लिखित आदेश दिखाने के बावजूद भी तुमने अंग्रेजों को किला क्यों नहीं सौंपा?
यशवंतराव ने इस समय मालकन को प्रामाणिकता से बताया कि अंग्रेज लोग झूठा आदेश दिखाकर भी मराठों के किलों पर अधिकार कर लेते है। इसलिए उसने महाराजा दौलतराव के आदेश को झूठा आदेश समझा और किला अंग्रेजों को सौंपने से इंकार किया। यहां यशवंतराव के उत्तर से एक बात खुलकर सामने आती हैं कि अंग्रेजों ने भारत में साम्राज्य विस्तार के लिए छल- कपट का सहारा लिया था। इस कारण अंग्रेज लेखकों के किसी कथन पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करने के लिए असीरगढ़ की घटना एवं यशवंतराव का कथन हमारे लिए एक तेज हथियार साबित हुए।

5. अनुसंधान को नयी दिशा :- अंग्रेजों की प्रामाणिकता के प्रति यशवंतराव के मन में जिस प्रकार का संदेह था, ‌ उसी प्रकार का संदेह अंग्रेज लेखकों द्वारा प्रस्तुत इतिहास के प्रति हमारे मन में भी जड़ें जमा लिया। इसकारण हमने सुनिश्चित किया कि अंग्रेजों द्वारा लिखित इतिहास को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि संबंधित लेखक की पार्श्वभूमी एवं वर्णित घटना की समकालीन परिस्थिति का पूरा अध्ययन करने के पश्चात ही उसे स्वीकार अथवा अस्वीकार करना चाहिए । इसकारण खंडन- मंडन पद्धति हमारे अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गयी।

6. डॉ. श. गो. कोलारकर का दृष्टिकोण :- इतिहास लेखक डॉ.कोलारकर की लेखनशैली एवं उनके दृष्टिकोण का भी हम पर काफी प्रभाव पड़ा। उनके जिस कथन ने हमें अनुसंधान का एक बुलंद हौसला एवं सही दिशा दिया वह कथन निम्नलिखित है –
“अंग्रेजों ने आप्पासाहेब भोंसले पर विश्वासघात का आरोप लगाया है। लेकिन उनके संबंध मे मराठी दस्तावेजों में निहित विविध उल्लेखों पर यदि एकसाथ विचार किया जाए वे विनाशकाल के उस अंधेरे में भी राष्ट्रोद्धार की भावना से चमकते हुए सितारे की भांति दिखाई देते हैं। अंग्रेजों द्वारा आप्पासाहेब भोंसले पर मनमानी संधियां जबरदस्ती थोपी गयी और नागपुर की सत्ता हथियाने के लिए उन्होंने आप्पासाहेब को जनता में बदनाम किया। इसलिए अंग्रेजों द्वारा लिखित इतिहास जैसे का वैसा स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसे राष्ट्रप्रेम की भावना के साथ नये सिरे से लिखने की आवश्यकता है।”( संदर्भ – नागपूर राज्याचा अर्वाचीन इतिहास, P.242)

7. हमारे द्वारा निष्पादित अनुसंधान ( Executed Research) :- उपर्युक्त विविध अनुभवों के कारण जब हमने ऐतिहासिक अनुसंधान की दिशा में कदम बढ़ाया तो अंग्रेज लेखकों द्वारा प्रस्तुत कथनों में निहित छल को समझना हमारे लिए बहुत आसान हो गया। इसलिए
उनके विचारों का खंडन एवं उपलब्ध नये तथ्यों के आधार पर नये विचार का मंडन, यह बात हमारे ऐतिहासिक अनुसंधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता बन गई। इन विशेषताओं से युक्त हमारे द्वारा निष्पादित प्रमुख तीन ऐतिहासिक संशोधन निम्नलिखित है –

7-1.परगने कामठा पर मौलिक संशोधन :- 2008 में हमने परगने कामठा पर संशोधन कार्य प्रारंभ किया। परगने कामठा की स्थापना कोलुबापू बहेकार द्वारा की गयी थी। जनश्रुति के अनुसार कामठा जमींदारी की स्थापना 1751 में हुई थी। लेकिन बंदोबस्त अधिकारी मि. लॉरेन्स ‌द्वारा 1867 में प्रस्तुत बंदोबस्त रिकॉर्ड के अनुसार चिमना जी भोंसले के द्वारा 1779 के कटक अभियान में सहयोग के उपलक्ष्य में कोलुबापू बहेकार को कामठा जमींदारी दी गयी थी।
लोगों के कथन एवं बंदोबस्त अधिकारी के कथन में भिन्नता थी। इसलिए हमने समकालीन राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में मि. लॉरेन्स के कथन की समीक्षा की एवं उस कथन को गलत पाया। इसकारण नये तथ्यों एवं सशक्त तर्क देते हुए हमने सिद्ध किया कि “कामठा जमींदारी की स्थापना नागपुर के महान शासक रघुजी प्रथम के शासनकाल (1737-1755) में हुई थी। उनके शासनकाल में, कटक विजय के उपलक्ष्य में 1751 में, नागपुर में भव्य विजयोत्सव मनाया गया था। उस उत्सव में ही रघुजी प्रथम के करकमलों द्वारा कोलुबापू बहेकार को कामठा जमींदारी उपहार के रुप में प्राप्त हुयी थी।” (संदर्भ – वीर राजे चिमना बहादुर 2028, ओ सी पटले, PP.39-52)

7-2.पोवार समाज के स्थानांतरण पर शोध :- पोवार समाज मूलतः मालवा का निवासी है। यह समाज मालवा से स्थानांतरित होकर वैनगंंगा अंचल में स्थायी रुप से बस गया है।
पोवार समाज की घनी आबादी महाराष्ट्र के गोंदिया, भंडारा तथा मध्यप्रदेश के बालाघाट एवं सिवनी इन चार जिलों में पायी जाती है।
पोवार समाज के स्थानांतरण के संबंध में रेज़ीडेन्ट जेनकिन्स ने लिखा है कि उन्हें मालवा से खदेड़ा गया है। हमने जेनकिन्स के बेबुनियाद कथन का जोरदार खंडन किया है और यह समाज बख्त-बुलंद को युद्ध में सहयोग करने के उद्देश्य से वैनगंंगा अंचल में स्थानांतरित हुआ है, इस बात को सशक्त ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सिद्ध किया।(संदर्भ- पोवारों का इतिहास- ओ सी पटले, PP.52-61)

7-3. पोवारों को भूमि के उपहार संबंधी शोध :- मराठा शासनकाल में पोवार समुदाय को उपहार स्वरूप प्राप्त वैनगंंगा अंचल की भूमि का संबंध में लगभग सभी विवरणों में चिमनाजी भोंसले के कटक अभियान के साथ जुड़ा हुआ है। लेकिन चिमनाजी भोंसले की व्यक्तिगत पार्श्वभूमी के आधार पर हमने इन विवरणों को अमान्य किया है।
नये ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत करते हुए कोलुबापू बहेकार को कामठा जमींदारी और पोवारों को वैनगंंगा क्षेत्र की भूमि राजे रघुजी प्रथम के समय नागपुर में आयोजित विजयोत्सव(1751) अवसर पर दी गई थी, इस सच्चाई को उजागर किया गया है।

8.एक मित्रतापूर्ण संवाद :- हमारे आमगांव में डॉ प्रभाकर गद्रे नामक विद्वान लेखक रहते है। वें डी. लिट. उपाधि प्राप्त व्यक्ति हैं। आज तक इतिहास पर उनके 60 ग्रंथ प्रकाशित हो चुके है। उनके अनुसंधान में नये तथ्यों की खोज को प्राथमिकता होती है। खंडन-मंडन को कोई स्थान नहीं होता। इसलिए वें कभी – कभी हमसे मज़ाक में कहा करते हैं कि आप अंग्रेज लेखकों के पीछे क्यों पड़ जाते हैं? तब हम भी उनसे मज़ाक में ही कह दिया करते है कि हां! अंग्रेज लेखकों के साथ हमारा रिश्ता बहुत पुराना है।
-ओ सी पटले
शनि.6/4/2024.
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