मराठा शासनकाल में पोवारों को उपहार में प्राप्त भूमि एवं कामठा जमींदारी के उदय के इतिहास पर नयी रोशनी…! (एक रोमांचकारी अनुसंधान की रोचक कहानी) -इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

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♦️ भारत में कृषि भूमि संबंधी प्रथम सर्वेक्षण 1867 में ए.जे.लॉरेन्स के नेतृत्व में हुआ था। इसे बंदोबस्त के नाम से जाना जाता है। बंदोबस्त रेकार्ड (Settlement Report 1867) को दीवानी दावों में बहुत अहमियत होती है।
♦️ मि. लाॅरेन्स के बंदोबस्त रिपोर्ट में मराठा शासनकाल मे कोलुबापू बहेकार को कामठा की जमींदारी एवं पोवारों को वैनगंंगा क्षेत्र की भूमि, एक ही समय उपहार के रुप में मिलने की घटना का उल्लेख है। इसमें उसने लिखा है कि — ” Chimnaji Bhonsla took the kunbi agent,by name Kolu, with him to Cuttack.On the Rajas return ,while he gave to many of the Powars lands to cultivate, to Kolu,he gave general authority over the whole of Kamtha, which at that time,was an inhabited Jungle… (संदर्भ- First Settlement Report ,1867- A.J. Lawrence, PP. 92-96.)
♦️ भंडारा जिला गजे़टीयर (1979) में भी उपरोक्त संदर्भ मूल स्वरुप में उपलब्ध है ।(संदर्भ-Bhandara District Gazetteer 1979, P. 135.)
बंदोबस्त रेकार्ड एवं भंडारा जिला गजे़टीयर में लिखित, चिमना जी भोंसले द्वारा कोलुबापू बहेकार को कामठा की जमींदारी एवं पोवारों को वैनगंंगा अंचल की भूमि का उपहार मिला था , यह जानकारी अन्य तथ्यों के आलोक में गलत प्रतीत होने होने के कारण प्रस्तुत लेखक द्वारा इसपर अनुसंधान किया गया। इस अनुसंधान में शासकीय दस्तावेजों में अभिलेखित एक कथन की वैधता (Validity) से आमना-सामना होने के कारण लेखक के लिए यह संपूर्ण अनुसंधान साहसपूर्ण एवं रोमांचकारी था। इस अनुसंधान की रोचक कहानी से सबको अवगत कराना यह इस लेख का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
1.मौखिक व लिखित जानकारी में विरोधाभास
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मि.लॉरेन्स के कथन में चिमनाजी भोंसले का उल्लेख है। मराठों के इतिहास से अवगत होता है कि चिमनाजी 1779 में कटक अभियान पर गया था। अतः लॉरेंस के कथन के अनुसार 1779 में पोवारों को भूमि एवं कोलुबापू को कामठा जमींदारी उपहार के रुप में मिली थी।
लेकिन 2008 में जब हमने कामठा जमींदारी पर अनुसंधान प्रारंभ किया तो बहेकार घराने के प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा अवगत हुआ कि 1751 में नागपुर में एक भव्य विजयोत्सव संपन्न हुआ था। उस विजयोत्सव में कोलुबापू बहेकार का जरी का फेटा और तलवार देकर सत्कार किया गया था और इसी समय उन्हें कामठा जमींदारी दी गयी थी।
2.लेखक के सामने उपस्थित चुनौती
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कामठा जमींदारी के उदय संबंधी लिखित और मौखिक जानकारी में विरोधाभास होने के कारण इस जमींदारी का उदय क्यों और कैसे हुआ? इस विषय पर अनुसंधान को कैसे आगे बढ़ाना यह समस्या हमारे सम्मुख एक चुनौती के रुप में उपस्थित हुयी।
3. अन्य तथ्यों की निष्पक्ष जांच
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3-1.बहेकार घराने की वंशावली
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आमगांव के जमींदार बाड़े से प्राप्त बहेकार घराने की वंशावली में कोलुबापू बहेकार का पुत्र पांडुबापू 1756 में आमगांव का जमींदार था, ऐसा लिखित दस्तावेज है। इस आधार पर स्पष्ट होता है कि कोलुबापू बहेकार को कामठा की जमींदारी 1756 के पहले ही प्राप्त हुई होगी।
प्रस्तुत संशोधक ने कामठा, आमगांव,सालेकसा,पलखेड़ा,हट्टा,लिंगा, किरनापुर आदि.गांवों में निवास करने वाले बहेकार घराने के अनेक लोगों से प्रत्यक्ष मुलाकात कर,उनके द्वारा कामठा जमींदारी के उदय संबंधी परंपरागत जानकारी अवगत की। कोलुबापू की वंशावली के लोगों द्वारा अवगत हुआ कि कामठा की जमींदारी 1751 में नागपुर के विजयोत्सव में उपहार स्वरूप प्राप्त हुई थी। इनकी वाणी से सुनी गयी कामठा जमींदारी के उदय की कहानी एवं कोलुबापू की वंशावली में दी गई जानकारी में साम्यता पाई गयी। इसलिए प्रस्तुत संशोधक द्वारा इस वंशावली की विश्वसनीयता (Reliability) को ग्राहय किया गया । इस वंशावली के कारण मि. लाॅरेन्स द्वारा प्रस्तुत कामठा जमींदारी के उदय संबंधी जानकारी के संबंध में हमारे मन में उत्पन्न शंका उत्पन्न हुई और अनुसंधान को हमने आगे बढ़ाया।
3-2 .द मिल्कियत केश ऑफ आमगांव जमींदारी(1866)
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ब्रिटिश काल में आमगांव के जमींदार माधवराव Vr. अंजोरा के जमींदार मल्हारराव बहेकार इन दो भाईयों का एक दिवानी मामला भंडारा न्यायालय में शुरू था। इसे “द मिल्कियत केश ऑफ आमगांव जमींदारी” के नाम से जाना जाता है।
उपर्युक्त मामले में कोलुबापू की वंशावली जोड़ी गयी थी। इस केश के दि.7 जुलाई 1866 के आदेश पर भी आमगांव जमींदारी यह लांजी के कमाविसदार द्वारा कामठा के जमींदार के पुत्र को देकर उसके देखरेख में सौंपी गयी थी, ऐसा स्पष्ट रुप से लिखा हुआ है तथा उस आदेशपत्र पर स्वयं ए.जे.लाॅरेन्स की सही और सिक्का है। ( संदर्भ -The Milkiyat Case of Mouza Amgaon-Judgement of the Deputy Commissioner dt.7th July 1866)
इसप्रकार अब उपर्युक्त दोनों तथ्य लॉरेंस के कथन के प्रतिकूल पाये गये। लेकिन फिर भी कोई अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित प्रतीत नहीं हुआ,और हमने आगे अनुसंधान शुरू रखा।
3-3.डॉ. श. गो. कोलारकर का ग्रंथ
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डॉ. श गो कोलारकर ने मराठों के इतिहास पर गहरा अनुसंधान किया है। उनके ग्रंथ से दो महत्वपूर्ण तथ्य अवगत होते हैं। प्रथम, चिमनाजी भोंसले राजा नहीं था।वह एक सुबेदार था। उसे 1779 में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने कटक भेजा गया था। लेकिन उसने अंग्रेजों के साथ मित्रता कर ली, मराठों के साथ गद्दारी की और मराठों की योजना के खिलाफ अंग्रेजों को सहयोग किया। द्वितीय, अंग्रेजों द्वारा लिखित जानकारी निष्पक्ष नहीं होती। जिन लोगों ने गद्दारी करके उन्हें साथ दिया उसे उन्होंने अच्छा बताया और जिन लोगों ने उनका विरोध किया, उसे बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।( संदर्भ – नागपूर राज्याचा अर्वाचीन इतिहास,PP.129-243)
4.लेखक द्वारा घटना का काल निर्धारण
(Author’s deting of Events)
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बहेकार घराने की वंशावली, द मिल्कियत केश आफ आमगांव जमींदारी तथा डॉ. कोलारकर के ग्रंथ का अध्ययन करने के पश्चात हमें मि.लॉरेन्स की जानकारी पूर्णतः गलत प्रतीत होने लगी। इसलिए हमने मराठा शासनकाल मे कामठा जमींदारी एवं वैनगंंगा क्षेत्र की कृषि भूमि उपहार स्वरूप कब प्रदान की गई होगी? इसका काल निर्धारण( Dating )करने के लिए निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किए।
4-1. राजे रघुजी का कटक अभियान
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राजे रघुजी प्रथम 1745 में कटक युद्ध पर गये थे। युद्ध में नवाब अलीवर्दीखान को परास्त करके विजय हासिल की थी और कटक के बाराभाटी किले पर मराठों का जरिपटका ध्वज फहराया गया था। कटक विजय के उपलक्ष्य में 1751 में नागपुर में विजयोत्सव मनाया गया था। इसमें अनेक शौर्यशाली व्यक्तियों को खेती – बाड़ी योग्य भूमि, जमींदारी, सुबेदारी आदि उपहार स्वरूप दिया गया था। मराठों के दस्तावेज में इसका उल्लेख है। बहेकार घराने के लोगों का कथन एवं मराठों के दस्तावेज में उपलब्ध जानकारी में समानता होने के कारण हमें लगने लगा कि लॉरेंस द्वारा कथित घटना संभवतः 1751 में घटित हुई है।
4-2. चिमनाजी भोंसले का कटक अभियान
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चिमनाजी भोंसले 1779 में कटक अभियान पर गया था। उसे पुणे के पेशवा नाना साहब की एक योजना के अनुसार 40 हजार सेना देकर, अंग्रेजों के साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा गया था। लेकिन उसने गद्दारी की और अंग्रेजों को हर प्रकार का सहयोग किया। इसके सबूत में हमने डॉ. कोलारकर के ग्रंथ के संदर्भ प्रस्तुत किया।( संदर्भ – नागपूर राज्याचा अर्वाचीन इतिहास,डॉ.कोलारकर,PP.128-166)
4-3. कामठा जमींदारी के विकास पर
दृष्टिक्षेप ————————————————
लॉरेन्स ने बंदोबस्त रिकॉर्ड में कामठा के जमींदार कोलुबापू, गोंदिबापू एवं चिमना बहादुर का कार्यकाल 1788 से 1818अंकित किया है। ( They exercised authority from Laji hills in the north,to the Baghnadi where it crosses the Great General Road in the south, over an area containing about one thousand square miles.They thus continued for 30 years from 1788 to 1818 A.D.)
सच्चाई यह है कि कामठा जमींदारी में बहेकार जमींदारों की सत्ता 1818 तक थी। बहेकार घराने के कोलुबापू,गोंदिबापू एवं वीर राजे चिमना बहादुर नामक तीन जमींदार हुए। कामठा के जमींदार कालुबापू ने कामठा के अधीन अनेक उप-जमींदारियां एवं शिकमी जमींदारी की स्थापना की।उसी प्रकार कामठा के जमींदारों ने अपने अधीन लगभग 1000चौ. मील के प्रदेश में खेती उद्योग विकसित किया। ये सब तथ्य प्रस्तुत करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया कि 1788 से 1818 तक यानी केवल 30 साल के अल्पकाल में कामठा में तीन जमींदारों का शासनकाल और परिपूर्ण क्षेत्र में कृषि-उद्योग का विकास यह दोनों बातें किसी परिकथा जैसी अविश्वसनीय प्रतीत होती है। इसप्रकार हमने मि. लॉरेन्स के विरुद्ध तीव्र अभिप्राय अंकित किया।
4-4.रघुजी प्रथम एवं चिमनाजी की तुलना
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सभी मराठा शासकों में नागपुर के रघुजी प्रथम की एक महान शासक के रुप में ख्याति है। उन्होंने अपने शासनकाल ( 1737-1755) में नागपुर राज्य का बंगाल की खाड़ी तक विस्तार किया और नागपुर राज्य में खेती -उद्योग तथा कपड़ा उद्योग को विकसित किया। यह सब तथ्य प्रस्तुत लेखक द्वारा प्रस्तुत किए गए। उसी प्रकार चिमनाजी भोंसले केवल सुबेदार था।उसका इतिहास कलंकित है। उसके द्वारा इस प्रकार के कार्य किए जाने का उल्लेख किसी भी दस्तावेज में नहीं पाया जाता ।इस सच्चाई को भी उजागर किया गया।
4-5. अंग्रेजों की स्वार्थ पूर्ण नीति
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अंग्रेज लोग साम्राज्यवादी थे। मनोवैज्ञानिक, राजनीति तथा कूटनीतिक दृष्टि से विचार करने पर उनके प्रयासों में जो लोग सहयोग किये,उनकी प्रशंसा करना एवं जो शासक सहयोग नहीं किये उन्हें बदनाम करना और उनके अच्छे कार्यों का श्रेय देशद्रोही को देने का प्रयास करना स्वाभाविक था। लेखक ने अपना यह विचार प्रस्तुत करते हुए अपने समर्थन में इतिहास के कुछ सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत किए। इसप्रकार अपने अनुसंधान को मजबूत नींव पर प्रस्थापित करने के पश्चात मि.लॉरेन्स के कथन पर तिखा प्रहार करते हुए हमने आत्मविश्वास पूर्वक अपना निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि “मि. लॉरेन्स ने महान रधुजी प्रथम के महान कार्य का श्रेय देशद्रोही चिमनाजी भोंसले को देने का प्रयास किया है। वास्तव में कामठा जमींदारी की स्थापना 1751 में हुई । कामठा में बहेकार घराने के तीन जमींदारों ने 1751 से 1818 तक यानी लगभग 70 साल तक शासन किया और हजार चौरस मील क्षेत्र को विकसित किया।” ( संदर्भ – वीर राजे चिमना बहादुर,2018, ओ.सी. पटले,PP.39-50.)
5. शोध को मिली संजीवनी!
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अनुसंधान में लॉरेंस के कथन के विपक्ष में सभी तर्क प्रस्तुत करने के पश्चात लेखक ने अपने तर्कों के समर्थन में भंडारा जिला गजे़टीयर का ही एक महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किया। इसमें कहा गया है कि –
“The large and valuable Zamindari of Kamtha was first granted in the middle of the eighteenth century on the payment of ₹60 annually.”(संदर्भ -Bhandara District Gazetteer,1979,P.96.)
उपर्युक्त विधान में कामठा जमींदारी के उदय के संबंध में in the middle of the eighteenth century ऐसा शब्द प्रयोग किया गया है। “इस आधार चित्र पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि 1751 के नागपुर विजयोत्सव के समय राजे रघूजी प्रथम द्वारा कोलुबापू को कामठा जमींदारी एवं पोवारों को वैनगंंगा क्षेत्र की विपुल भूमि उपहार के रुप में मिली थी।” अतः ‌लॉरेन्स के कथन विरोधी हमारी पैरवी (Argument) में भंडारा जिला गजे़टीयर का तथ्थ संजीवनी साबित हुआ।
6.ICHR नई दिल्ली द्वारा स्वीकृति
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किसी भी ऐतिहासिक अनुसंधान को जब-तक इतिहास के शीर्षस्थ विशेषज्ञों द्वारा स्वीकृत नहीं किया जाता, तब-तक उसे
समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होना कठिन है। इसलिए यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रस्तुत लेखक द्वारा उपर्युक्त अनुसंधान 2008- 2018 इस कालखंड में किया गया।यह अनुसंधान “वीर राजे चिमना बहादुर” नामक ग्रंथ में समाहित है। इस ग्रंथ को भारत सरकार के मानव संसाधन विकास के अंतर्गत lCHR नई दिल्ली द्वारा नियुक्त विषय विशेषज्ञ (Expert) द्वारा जांचा गया है और तत्पश्चात इसे ICHR द्वारा ₹ 30 हजार का अनुदान प्राप्त हुआ था। यह ग्रंथ शासकीय अनुदान से 2018 में प्रकाशित हुआ है।
7.एक अनूठा अनुसंधान
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शासकीय बंदोबस्त प्रतिवेदन (Settlement Report 1867) एवं भंडारा जिला गजे़टीयर (1979) में दर्ज एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को गलत साबित कर मराठा शासनकाल में पोवारों को वैनगंंगा अंचल की भूमि एवं कोलुबापू बहेकार को कामठा की जमींदारी उपहार स्वरूप प्राप्त होने की घटना पर एक नयी रोशनी डाली गई है। इसलिए यह अनुसंधान प्रस्तुत लेखक के जीवन का एक ऐसा महत्वपूर्ण अनुसंधान है, जिसने लेखक को ऐतिहासिक अनुसंधान के क्षेत्र में प्रस्थापित कर दिया। यह एक ऐसा अनोखा अनुसंधान है, जो ऐतिहासिक अनुसंधान की एक अलग राह आलोकित करता है।
-ओ.सी.पटले
शनि.20/4/2024.
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