वैनगंगा अंचल के क्षत्रिय पोवार समाज का संघर्षमय ‌इतिहास ( दुर्लक्षित इतिहास पर मौलिक अनुसंधान) -इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले

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वैनगंगा अंचल के क्षत्रिय पोवार समाज का संघर्षमय ‌इतिहास
( दुर्लक्षित इतिहास पर मौलिक अनुसंधान)
-इतिहासकार प्राचार्य ओ सी पटले
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1. प्रस्तावना
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सामान्यतः इतिहास में लिखी बातों पर सभी विश्वास करते है। बहुत कम व्यक्ति जानते हैं कि इतिहास बनते और बिगड़ते रहता है। इसलिए ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों द्वारा जो इतिहास लिखा गया है,उसपर निष्पक्ष रुप से अनुसंधान की एवं इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता भारतीय विद्वानों द्वारा महसूस की जा रही है।
हमारे पूर्वजों की वाणी से हम सबको अवगत हुआ है कि हमारा समाज क्षत्रिय कहलाता है एवं मालवा का मूल निवासी है। पूर्वजों की वाणी से अवगत जानकारी नि: संदेह विश्वसनीय है। ब्रिटिश कालीन सभी लेखकों के ग्रंथ एवं शासकीय दस्तावेजों द्वारा भी हमारे पूर्वजों के इस कथन की पुष्टि होती है।
2.पोवारों का स्थानांतरण कब हुआ?
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पोवार समाज के स्थानांतरण के संबंध में दो प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। प्रथम, पोवार समाज मालवा से वैनगंंगा अंचल में कब स्थानांतरित हुआ? द्वितीय, यह समाज मालवा से वैनगंंगा अंचल में क्यों स्थानांतरित हुआ?
ब्रिटिश कालीन सभी विवरणों में कहा गया है कि पोवार समाज मुगल सम्राट औरंगजेब ( 1658- 1707)एवं देवगढ़ का गोंड राजा बख्त-बुलंद के शासनकाल ( 1668-1708) में मालवा से स्थानांतरित हुआ है।
3. पोवारों का स्थानांतरण क्यों हुआ?
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औरंगजेब एक क्रुर, ज़ुल्मी, अत्याचारी और धोखेबाज शासक था। उसके जुल्मों से एवं उसके द्वारा की गयी हत्याओं से भारत का इतिहास भरा पड़ा है।
इसलिए जब भी कोई पाठक इतिहास में पढ़ता है कि औरंगजेब के शासनकाल में, मालवा से वैनगंंगा अंचल में पोवारों का स्थानांतरण हुआ है, तब उस पाठक के मन-मस्तिष्क में पोवार समाज के लोग औरंगजेब के अत्याचारों का मुकाबला न करने के कारण मालवा से पलायन (run away) किये और वैनगंगा अंचल में आकर स्थाई रुप से बस गये है, यह विचार घर कर जाता है।
4.पोवार समाज की प्रतिष्ठा का सवाल
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पोवार समाज का स्थानांतरण क्यों हुआ ? यह एक साधारण प्रश्न नहीं हैं। इसका संबंध पोवार समाज की प्रतिमा (Image) से संबंधित है। इसलिए हमने पोवारों के स्थानांतरण पर अनुसंधान करने का मानस बनाया।
5. स्थानांतरण संबंधी अनुसंधान
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रेज़ीडेंट जेनकिन्स ने पोवारों के स्थानांतरण के संबंध में लिखा है कि “उन्हें मालवा से खदेड़ा गया। (संदर्भ -They say their ancestors were expelled from Dhar -Rechard Jenkins , Reports on the Territories of the Raja of Nagpur ,1827,P.36.) ” इसके विपरित एम.ए.शेरिंग ने लिखा है कि “उन्होंने मालवा छोड़ा।( संदर्भ -Powars of Malva, quitted their country in the region of the Emperor Aurungazebe. -S.A.Sherring, Hindu Tribes and Castes, Volume ll,P.93.)
उपर्युक्त दोनों लेखक अंग्रेज है। पोवारों के स्थानांतरण के संबंध में दोनों के कथन परस्पर विपरीत है। इसलिए हमने पोवारों के स्थानांतरण का सही कारण जानने के लिए औरंगजेब के समकालीन इतिहास का गहण अध्ययन किया और पाया कि उसके शासनकाल मे उसके जुल्मों के कारण हिन्दुओं में कोई भगदड़ नहीं मची थी। बल्कि उस समय उसके जुल्मों के खिलाफ बुंदेलखंड, मालवा, राजस्थान, पंजाब, आदि सभी क्षेत्रों में जबरदस्त विद्रोह शुरू था। औरंगजेब के खिलाफ मारवाड़ में दुर्गादास राठौड़, बुंदेलखंड में छत्रसाल बुंदेला, पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह, मालवा में परमार सरदार और देवगढ़ में बख्त-बुलंद आदि सबने जबरदस्त विद्रोह प्रारंभ कर दिया था। इन सब विद्रोह के कारण औरंगजेब का शासन कमजोर हुआ और मुगल साम्राज्य का पतन सुनिश्चित हुआ।
औरंगजेब की समकालीन राजनीति का अध्ययन करने के पश्चात हमने पाया कि छत्रसाल बुंदेला एवं बख्त-बुलंद की गुप्त मंत्रणा के पश्चात क्षत्रिय पोवार समाज के लोग बख्त-बुलंद को देवगढ़ की गद्दी पर पुनर्प्रस्थापित करने के लिए आये थे और अपना लक्ष्य संपादित कर वें अपने उज्जवल भविष्य की संभावना को देखते हुए यहां स्थाई हो गये।
6.भूमि का उपहार कब प्राप्त हुआ ?
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भारत में अंग्रेज लोग शासन करने आये थे। वें भारतीयों का सोया हुआ स्वाभिमान जगाने नहीं आये थे, बल्कि उन्हें भारत में अपने साम्राज्य की जड़ें मजबूत करने के लिए स्वाभिमान हीन और गद्दार लोगों की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने भारतीयों के स्वाभिमान को नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया।
भारत के राष्ट्रभक्त एवं महान शासक अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति को पोषक नहीं थे इसलिए उन्होंने ऐसे शासकों के अच्छे कार्य का श्रेय गद्दार लोगों के नाम अंकित कर देना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। यही बात महान मराठा शासक रघुजी प्रथम के संबंध में की गयी है।
बंदोबस्त अधिकारी मि.ए. जे. लॉरेन्स ने लिखा है कि चिमनाजी भोंसले के साथ पोवार समाज के कुछ लोग कटक अभियान पर गये थे। कटक से वापस आने के पश्चात उन्हें वैनगंगा क्षेत्र की विपुल भूमि कृषि उद्योग के लिए उपहारस्वरूप दी गई।( संदर्भ – Chimnaji Bhonsla took the kunbi agent,by name Kolu, with him to Cuttack.On the Rajas return ,while he gave to many of the Powars lands to cultivate, to Kolu,he gave general authority over the whole of Kamtha, which at that time,was an inhabited Jungle…,First Settlement Report, 1867- A.J. Lawrence, PP. 92-96.)
परंतु मराठाकालीन इतिहास के दस्तावेजों से पता चलता है कि चिमनाजी भोंसले न तो राजा था और न कोई ऐसा महान सूबेदार था जिसने मराठा राज्य के उत्थान में अमूल्य योगदान दिया हो। वस्तुत: वह अंग्रेजों का हितचिंतक और अंग्रेजों का मददगार था। लेकिन हम अबतक अंग्रेज़ो द्वारा लिखित ग़लत तथ्यों पर आंख बंद करके विश्वास करते आये है कि पोवारों को चिमनाजी भोंसले द्वारा पोवारों को भूमि का उपहार मिला था।
मराठाकालीन इतिहास में अनुसंधान की दिशा में हमारी विशेष दिलचस्पी रही है और हमने अपने अनुसंधान में पाया है कि कामठा जमींदारी का उदय सत्रहवीं सदी के मध्य में हुआ था। (संदर्भ – The large and valuable Zamindari of Kamtha was first’ granted in the middle of the eighteenth century on a payment of ₹60 annually – Eyre Chatterson, Story of Gondwana, P.46)
उपर्युक्त मौलिक स्त्रोत के आधार पर हमने प्रमाणित किया है कि पोवारों को वैनगंगा अंचल की भूमि का उपहार चिमनाजी भोंसले के कलंकित हाथों से नहीं, बल्कि नागपुर के महान शासक राजे रघुजी प्रथम (1737-1755)के करकमलों द्वारा, कटक विजय के उपलक्ष्य में नागपुर में आयोजित भव्य विजयोत्सव (1751) के अवसर पर प्राप्त हुआ था।( संदर्भ – उत्तर मध्ययुगीन परगने कामठा के विशेष संदर्भ में – वीर राजे चिमना बहादुर, भारत सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त ग्रंथ,2018,ओ सी पटले)
7. उपसंहार
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पोवार समुदाय क्षत्रिय होने के कारण
पुरातन काल मे राष्ट्रधर्म के पालन के लिए युद्ध तथा जीविकोपार्जन के लिए कृषि उद्योग यही इस इस समुदाय का कार्य था। ब्रिटिश काल में पोवार समुदाय के लोगों ने मालगुजारी , जमींदारी एवं कास्तकारी को अपने जीवन यापन का माध्यम बनाया। आज़ादी के पश्चात हमारे समाज ने शिक्षा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। शिक्षक, वकील, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, व्यापार एवं उद्योग आदि सभी क्षेत्र में समाज कामयाबी की ध्वजा फहराते हुए आगे बढ़ रहा है।
परंतु भारत की आज़ादी के पश्चात बदलते हुए परिवेश में हमने अपने समाज की पहचान, अस्मिता , स्वाभिमान मातृभाषा, संस्कृति , धर्मनिष्ठता के संरक्षण – संवर्धन तथा समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं वैचारिक उत्कर्ष को दुर्लक्षित किया।‌ थोड़ा विलंब से ही क्यों न सही लेकिन अब हमारा समाज ‌विगत गलतियों के खिलाफ जागृत हो चुका है। अखिल भारतीय क्षत्रिय पोवार (पंवार) महासंघ के कुशल नेतृत्व में अब हम अपनी ऐतिहासिक पहचान बचाने एवं समाज का सर्वांगीण विकास करने की दिशा में अविरत दिन – रात प्रयत्नशील है और अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रयत्नों की पराकाष्ठा करेंगे।
शुक्र.24/5/2024.
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