“खरासली” — एक भूली-बिसरी विरासत की शोधयात्रा

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गोंदिया जिले के माजी जमीनदारों के वाडों और पुरातन वस्तुओं की खोज में निकली एक अनोखी यात्रा, जिसने अतीत की स्मृतियों को फिर से जीवंत कर दिया

✍️ लेखन : ॲड. लखनसिंह कटरे,

ग्राम – बोरकन्हार, ता. आमगांव, जि. गोंदिया (महाराष्ट्र)
दिनांक : 01 अगस्त 2025

इतिहास तब तक जिंदा रहता है, जब तक कोई उसे खोजने, समझने और सहेजने की जिद करता है। 31 जुलाई 2025 को एक ऐसी ही प्रेरणादायक यात्रा हुई, जब हमने गोंदिया जिले के माजी जमीनदारों के जीर्ण-शीर्ण हो चुके वाडों और वहाँ पड़ी जीवनोपयोगी प्राचीन वस्तुओं की खोज का बीड़ा उठाया। इस शोधयात्रा में हमारे साथ थे – श्री अनिल देशमुख (सेवानिवृत्त उपायुक्त, सामाजिक न्याय विभाग), श्री प्रवीण रहांगडाले (स्व. पी.डी. रहांगडाले – महाराष्ट्र विधानसभे के प्रथम समाजवादी विरोधी पक्ष नेता – के नाति), डाॅ. श्री टुंडीलाल कटरे (जामखारी के माजी जमीनदार वंशज) और श्री बंडूभाऊ / विजय रहांगडाले (फुक्कीमेटा के माजी जमीनदार परिवार के ज्येष्ठ सुपुत्र)।

जामखारी की हवेली (बाड़ा)☝️

वळद की हवेली(बाड़ा) 

भव्य वाडों की खोज में…

इस शोधयात्रा के अंतर्गत हमने जामखारी, फुक्कीमेटा और वळद (कटंगटोला) स्थित माजी मालगुजारों के वाडों का दौरा किया।

  • जामखारी में श्री लेखेश्वर कटरे एवं डाॅ. टुंडीलाल कटरे के वाडे को देखकर हम चकित रह गए। वर्षों पुराने होते हुए भी यह वाडा आज भी संपूर्ण स्वच्छता और व्यवस्थित संरक्षण के साथ खड़ा है।
  • फुक्कीमेटा में श्री बंडूभाऊ रहांगडाले का वाडा एवं
  • वळद / कटंगटोला में स्व. पी.डी. रहांगडाले परिवार का वाडा – इन वाडों में इतिहास की गूंज साफ सुनाई देती है।

इस दौरान श्री अनिल देशमुख द्वारा एकत्र किए गए निजी वस्तुसंग्रहालय हेतु कुछ महत्वपूर्ण पुरातन कृषि व गृह उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त हुईं। आज ये वाडे भले ही जीर्ण अवस्था में हों, लेकिन उनका भव्य अतीत अब भी दीवारों पर बोलता दिखता है।

खरासली — एक शब्द, एक स्मृति, एक पहचान

शोधयात्रा के दौरान चर्चा चली – पुराने, अब लगभग लुप्तप्राय, लोकप्रचलित शब्दों की। तभी मैंने (लेखक) “खरासली” शब्द का उल्लेख किया, जो मेरे गाँव बोरकन्हार में एक विशेष भूभाग के लिए प्रचलित है।

मैंने बताया कि गाँव के बाहर एक मुरम वाली जमीन जिसे लोग “खरासली” कहते हैं, वहाँ आज जिला परिषद की स्कूल (कक्षा 7 तक) और ग्रामपंचायत भवन स्थित हैं। परंतु मेरे पिताजी स्व. मोहनलाल कटरे (भूतपूर्व पुलिस पाटील) कहा करते थे कि कभी वहाँ घने जंगल हुआ करते थे और हमारे वाडे की छपरी के लिए लकड़ी वहीं से लाई गई थी।

इस पर श्री प्रवीण रहांगडाले और श्री बंडूभाऊ रहांगडाले ने बताया कि पुराने समय में हमारी जमीनदारी की जंगलों में पारिजातक के वृक्ष बहुतायत में पाए जाते थे। झाडीबोली में पारिजातक को ही “खरासली” कहा जाता था।

इस जानकारी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि – “खरासली” शब्द की उत्पत्ति संभवतः पारिजातक वृक्षों से समृद्ध उस जंगल से हुई होगी, जो कालांतर में मुरम से भरा मैदान बना और जिसका नाम लोकश्रुति में जीवित रहा।

आज जब हम आधुनिकता की दौड़ में अतीत को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, ऐसे समय में ये शोधयात्राएँ हमारे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों की पुनः स्थापना में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। वाडों की दीवारों से टपकती इतिहास की नमी, लकड़ी के छतों पर उकेरी गई कलात्मकता, और हर वस्तु में बसी एक कहानी – ये सब कुछ हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं।

“खरासली” एक भूभाग का नाम भर नहीं, बल्कि एक युग का दस्तावेज़ है। ऐसे शब्दों, वस्तुओं और स्थलों के प्रति जागरूकता, संवर्धन और दस्तावेजीकरण आज की सबसे जरूरी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

 लेखन व अनुभूती:
ॲड. लखनसिंह कटरे,
ग्राम – बोरकन्हार, ता. आमगांव,
जिला – गोंदिया (महाराष्ट्र)
दिनांक : 01 अगस्त 2025